परिचय

आप सी. एल. वर्मा (छगनलालवर्मा) R.A.S. (Rtd.) ग्राम  बिचून  तहसील दूदू  जिला जयपुर के  मूलनिवासी  हैं  तथा  आपने  रघुवंशी  रैगर जातिके  गुसाईवाल नामक गोत्रवंश मेंजन्म लियाहै ।आपके पिता श्री केशरलाल जी गुसाईवाल थे तथा माता श्रीमती नाथी देवी थी।आप  एक मेधावी विद्यार्थी रहे हैं।आप मूल रूप से,  ग्रामीण परिवेश से  है  तथा अब तक की जानकारी के अनुसार, आप दूदू  तहसील जिला जयपुर के सीधी भर्ती के पहले  तहसीलदार तथा राजस्थान प्रशासनिक सेवा संवर्ग  के दूसरे अधिकारी है।आपने  राजस्थान विश्वविद्यालय से  गणित विषय  में  B.Sc.(Hons.), M.Sc.  तथा   बाद में  LL.B.  की  उपाधि  प्राप्त की है।

आपने हर उस व्यक्ति का विरोध किया है,  जिसने रैगर जाति को अन्य  नाम  से  पुकारने की  कोशिश की  है या बनावटी तरीके  से  रैगरजाति  को  दूसरा  नाम  देने  की कुचेष्टा की  है या रैगर जाति को सामान्य समाज में बदनाम  किया है, चाहे  वह  कोई स्वार्थी  रैगर  ही  क्यों नहीं  है।

आपको  रैगर इतिहास लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

आपको  बचपन से ही  रैगर जाति के इतिहास  को  जानने  की  तीव्र अभिलाषा थी तथा सर्व प्रथम् स्वामी जीवारामजी  महाराज  द्वारा लिखी गयी कृतियों  से आपको रैगरजाति के पूर्वजों के बारे में,  कुछ जानकारी  प्राप्त  हुई।लेकिन  जब सन् 1988 ईस्वीमें, आपका पदस्थापन तहसीलदार बयाना के पद पर हुआ, तब  आपको  यहज्ञात हुआ कि राजस्थान के भरतपुर-क्षेत्र  में, अनेक गांवों  के नाम  रैगर गोत्रों के नामों  पर  है।आपने  उनके संबंध  में  विस्तृत   छान-बीन की,  जिससे  आपको  यह जानकारी  मिली  कि पौराणिक या  अकबर- कालीन  किसी  भी  गांव या  शहर  के नामपर, एक भी  रैगर गोत्र नाम नहीं  है ।दोयम  उस  क्षेत्र  में आबाद जाटव  जाति के  अनेक  गोत्रनाम  वही  है,  जो  रैगर  गोत्रनाम भी है  तथा किसी किसी गोत्र के जाट व तो उसी गाँव में  या पास के दूसरे गाँव में  ही रहते हैं,  जिसका नाम उन्हीं के गोत्रनाम पर है , जैसे  हिण्डौनिया  हिंडौन में,  सालोदिया सालोदा  में  रहते हैं, आदि।

उक्त  जानकारी  के बाद आपका  रैगर इतिहास लिखने का मानस पक्का हो गया तथा आपने  रैगर जाति और अन्य जातियों  पर लिखे गये  कई  इतिहास  के ग्रंथों  का गहन अध्ययन किया तथा उनसे आपने खासतौर  से यह पाया  कि रैगरजाति में  जन्में इतिहासकारों द्वारा लिखे गये रैगर इतिहास के ग्रंथों में, उल्लेखित तथ्यों  एवं घटनाओं में, स्पष्टतया  देशकालिक विरोधाभास  विद्यमान  है।

आपका यह भी कहना है कि रैगर इतिहास कारों द्वारा एकत्रित किये गये तथ्य सही एवं प्रशंसनीय है।यध्यपि रैगर समुदाय ने अपनी आजीविका के लिये पिछली सदी में क्या किया और क्या नहीं किया? वह कोई छिपाने की बात नहीं है।लेकिन दुःख इस बात का है कि पूर्व के कई इतिहासकारों के द्वारा उन बहुमूल्य सामग्री का  गलत दिशा में  विश्लेषण कर दिया गया है।जैसाकि-

श्री रूपचंद जी जलुथरिया द्वारा यह  निष्कर्ष निकाला गया है कि कि भरतपुर धौलपुर रियासत की जाटव जाति के गोत्र नामों का रैगरगोत्र नामों के सामान होने का कारण, यह है कि रैगर जाति का निकास जाटव जाति से हुआ है ।लेकिन साथ ही, वे ऐसा भी कहते हैं कि रैगरजाति चमारजाति की उपजाति नहीं है।रैगर रैदास्या भी नहीं है। जबकि भारत की स्वतंत्रता के बाद तक भी जाटवों को चमार कहा जाता था और रेवेन्यू रिकॉर्ड्स में भी चमार लिखा जाता था। स्पष्टतः इससे तो स्वयं जलुथरिया जी ने अपनी ही बात का खण्डन कर दिया है। अर्थात् जलुथरिया जी से कोई गलती अवश्य हुई है।हाँ,  हुई है। क्योंकि असल में सन् 1920 ईस्वी के बाद वहां के कई रैगर परिवार जाटव बन गए थे।अतःआज दोनों जातियों के कई गोत्र नाम सामान दिखते हैं। अर्थात् जलुथरिया जी  द्वारा रैगर जाति उत्पत्ति का सिद्धांत ही गलत दिशा में प्रतिपादित कर दिया गया है।

इसी प्रकार चन्दन मल जी नवल ने भी रघुकुल चिंतामणी के दोहे का गलत विवेचन कर 9 वीं सदी के रगर रघुवंशी समुदाय को चर्म रंगाई से जोड़ दिया।लेकिन इस बात पर बिलकुल भी विचार नहीं किया गया कि

यदि 9वीं सदी में रैगर जाति का काम चर्म रंगाई होता तो क्या ब्राह्मण राजशेखर अपने राजा के गुज्जरवंश के साथ रैगर जाति का गुणगान करता ?
जबकि इन दोनों इतिहासकारों द्वारा जुटाये गए बहुमूल्य तथ्य और जाट इतिहास ग्रन्थ रैगर इतिहास लिखने के महत्वपूर्ण आधार है।
उधर निम्नवर्ग की दूसरी जाति में जन्में इतिहासकारों द्वारा उनकी जाति के इतिहास-ग्रंथों में रैगर जाति की तुलना में, अपनी ही जाति को महामंडित करने पर,अधिक ध्यान दिया गया है। कुछ ग्रंथों में रैगर जाति को गलत रूप में भी पेश किया गया है।
उच्चवर्ग में जन्में इतिहासकारों ने रैगर जाति की वर्तमान सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक प्रस्थिति को आधार बनाकर, अर्थात् रैगरों के वर्तमान को शाश्वत मानकर, पहले तो रैगरों भूत पैदा किया गया है। फिर मनमाने ढंग से रैगर जाति और रैगर शब्द के कई गलत इतिहास रच दिये हैं, जिनसे केवल भोले भाले रैगरबन्धु ही नहीं,अपितु कई विद्वान् तक भी, आश्वस्त हो चुके हैं । जैसाकि उनके द्वारा रैगर जाति को जातीय और आनुवांशिक तौर पर, रैदासजी से जोड़ दिया गया है। लेकिन यह गलत है। क्योंकि उनसे रैगरों का केवल श्रद्धा का संबंध था। जबकि आज कई भोले भाले रैगरबन्धु रैदासजी को अपना वंश पिता तक मान बैठे हैं।
आपने यह भी प्रमाणित किया है कि रैगर जाति और रैगर शब्द का अस्तित्व तो हजारों वर्ष पुराना है। जिस पर विदेशी विद्वानों ने भी विचार किया। लेकिन कुछ रैगर विरोधी तत्व, रैगर शब्द को, जिस प्रकार से पेशागत शब्द साबित करने की मुहिम छेड़ रखी है, उसको एक तुच्छ स्वार्थ के लिये स्वीकार करने के बजाय, समस्त रैगर समुदाय को एक जुट होकर, उसका विरोध करना चाहिये। घबराने की जरूरत नहीं है। रैगर शब्द का गैर-पेशागत शब्द होने की सच्चाई को स्वीकार करने से भी, रैगर जाति का आरक्षण खत्म होने वाला नहीं है।
उक्त गलत तथ्यों का निराकरण होना अत्यावश्यक है।अतः इसके लिए, रैगर जाति का एक क्रमिक, देशकालिक, तार्किक, विश्लेषणात्मक एवं विश्वसनीय इतिहास लिखने के लिये, आप नब्बे के दशक से प्रयासरत है।
उसमें जो भी आपको सफलता मिली है, उसको आमजन के समक्ष कुछ आलेख तथा कृतियों के रूप में , पेश करने की इच्छा की है ताकि रैगरबन्धु अपनी वास्तविकता को पहचाने और किसी भी प्रकार की बनावटी बात या भ्रान्ति के चक्कर में फँसकर, न तो वे स्वयं कुण्ठित हों और न ही, वे अपने को अन्य किसी से हीन समझे ।
इसी उद्देश्य से आपने www.raigar.net नाम से एक वेबसाइट भी बना रखी है।

—–जानकारी से

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