रैगर रघुवंशी समुदाय के लिए एक अभिशाप साबित होता काका कालेलकर आयोग

रैगरों के प्रति आयोग की दुहरी मानसिकता की नीति  

           राजस्थान की अनुसूचितजाति अनुसूची, 1950 में रैगर जाति का नाम स्वतंत्र क्रमांक 36 पर दर्ज है। आगे चलकर ‘काका कालेलकर आयोग’ ने उक्त अनुसूची के मूलस्वरूप को बदलवा दिया और उसने बैरवा, बलाई व मेघवाल को तो अलग-अलग तीन नये क्रमांकों पर दर्ज करवाकर, उनको स्वतंत्र जातियों का सवैधानिक दर्जा दिलवा दिया, परन्तु उसने रैगर जाति के उक्त स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त करवा दिया और रैगर जातिनाम को ‘चमार-संवर्ग’ के क्रमांक पर लिखवा दिया, जिसके कारण रैगर जाति की सामाजिक छवि धूमिल हुई और आम जनमानस पटल से उसकी चिरपरिचित प्राचीन क्षत्रियकुलीन आनुवंशिकता [1] समाप्त हुई।

आयोग द्वारा अन्य प्रान्तों में रैगरों के अधिकारों की उपेक्षा करना   

          50 के दशक में सम्पूर्ण राजस्थान तथा इसकी सीमा के लगते प्रान्तों के सीमांत भूभागों में रैगर रहते थे, जिनको न तो संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के समय बनाई गई की अनुसूचितजाति अनुसूची,1950 में शामिल किया गया था और न ही ‘कालेलकर आयोग’ ने उन समस्त रैगरों को अनुसूचितजाति अनुसूची, 1956 में शामिल करने की सिफ़ारिश की।

रैगर जाति की सरकार से अपेक्षा

          ‘कालेलकर आयोग’ की भूल या गलती को सुधारने की आवश्यकता है। अर्थात् सन् 1956 की सूची में संशोधन करवाया जाकर, रैगर जाति के सन् 1950 के स्वतंत्र अस्तित्व को पुनःबहाल किया जाये तथा राजस्थान अनुसूचित जाति सूची में रैगर जाति को उस क्रमांक पर दर्ज किया जाये, जिस पर वर्तमान में बोला अंकित है, क्योंकि बोला भी रैगर ही है और अन्य प्रान्तों में रैगर जाति को स्वतंत्र क्रमांक पर दर्ज करवाया जाये।

काका कालेलकर आयोग द्वारा रैगर जाति के साथ अन्याय करना   

          राजस्थान की अनुसूचितजाति सूची, 1950 में बैरवा, बलाई व मेघवाल जातिनाम दर्ज नहीं हैं। रैगर जाति को यह शिकायत नहीं है कि ‘काका कालेलकर आयोग’ ने इन जातिनामों को राजस्थान की अनुसूचितजाति सूची, 1956 में अलग-अलग स्वतंत्र क्रमांकों पर क्यों दर्ज करावाया है? परन्तु रैगरों की गंभीर आपत्ति यह है कि जब राजस्थान की अनुसूचितजाति सूची, 1950 में रैगर जाति का नाम स्वतंत्र क्रमांक 36 पर दर्ज था तो उसका नाम सन् 1956 की अनुसूची में ‘चमार-संवर्ग’ के क्रमांक पर क्यों लिखवा गया? जबकि यह सर्वविदित है कि बैरवा, मेघवाल परम्परागत चमार जातिनामों के स्थान पर रखे गये, नये जातिनाम हैं और 50 के दशक में आम समुदाय द्वारा बलाई जाति के एक बड़े समूह(जाटा बलाई) को भी चमार जातिनाम से ही संबोधित किया जाता था। अतः यह सोचनीय है कि ‘कालेलकर आयोग’ ने राजस्थान की जातियों का वर्गीकरण करने से पहले, यह विचार ही नहीं किया कि किसी समूह की वर्तमान आजीविका से और कुछ ही महीनों/वर्षों पूर्व छोड़ी गई परम्परागत आजीविका से उसके बाप-दादाओं का वर्ण या उनकी जातियों का संवर्ग निर्धारित नहीं किया जा सकता है।

         ‘कालेलकर आयोग’ ने एक अन्याय यह भी किया है कि उसने पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र की अनुसूचियों में रैगर जातिनाम को शामिल करने की सिफारिश ही नहीं की, जो वहाँ के रैगरों का सीधा संवैधानिक हनन ओर अन्याय है। उक्त ‘आयोग’ द्वारा रैगर जाति का गलत संवर्गीकरण करना और राजस्थान के पड़ौसी प्रान्तों के रैगरों को आरक्षण नहीं दिलवाना किसी अभिशाप से कम नहीं हैं, जो निम्नानुसार स्पष्ट होता है-

1- रैगर जाति की स्वतंत्र पहचान को खत्म करवाना-

           निम्नवर्ग की जातियों को श्रेणीबद्ध करने की शुरुआत ब्रिटिश-शासन के दौरान शुरू हों गयी थी। कहा जाता है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर  के परामर्श से ब्रिटिश भारत सरकार ने अनुसूचित जातियों की एक सूची बनाई थी और उसकी क्रियान्विति के लिए The Government Of India (Scheduled Castes) Order, 1936[2] पास किया गया, परंतु उसमें रैगर जाति के नाम को शामिल नहीं किया गया था, जिसके परिणाम स्वरूप The Government of India Act,1935 के अंतर्गत होने वाले आम चुनावों में कोई रैगर अपना नामांकन नहीं भर सका था और रैगरों का भारत सरकार मे शामिल होने का रास्ता बंद कर दिया गया, जबकि राजपूताना के अलावा अजमेर व दिल्ली सहित कम से कम पाँच प्रान्तों में रैगर रहते थे। कई रैगर गांधीजी की दांडी यात्रा में शामिल हुए थे। रैगर(रेहगर) नमक उत्पादन का कार्य करते थे। [3]

           कालांतर में  सन् 1936 की सूची के विरुद्ध रैगर आदि जातियों ने आपत्तियाँ पेश की और कई संशोधन प्रस्ताव आए और सरकार ने CO19::The Constitution (Scheduled castes) Order, 1950[4] पास किया, उसमें रैगर जाति को केवल राजस्थान राज्य की अनुसूचित जाति सूची के क्रमांक 36 पर स्वतंत्र रूप से शामिल किया गया। उसके 01 वर्ष बाद CO 32:: The Constitution( Scheduled Caste) Order,1951[5] पास किया, उसमे रैगर जाति को केवल केंद्रशासित राज्य दिल्ली की सूची के क्रमांक 36 पर स्वतंत्र रूप से शामिल किया गया। परन्तु ‘कालेलकर आयोग’ ने सन् 1950 व 51 की अनुसूचियों में अंकित रैगरों की स्वतंत्र पहचान को खत्म करवा दिया और सन् 1956 की अनुसूची में उसे ‘चमार-संवर्ग’ की जाति बनवा दी और बैरवा, बलाई, मेघवाल जातियों को ‘चमार-संवर्ग’ से मुक्ति दिला दी।

          जब ‘काका कालेलकर आयोग’ राजस्थान में आया था, उस समय रैगर समाज सुधार आंदोलन ‘मृतप्राय’ हो गया था। रैगर समाज सुधारक अपनी जाति के मान-सम्मान के विरुद्ध किये जाने वाले दुष्कृत्यों के प्रति उदासीन हो गए थे। ऐसा लगता है कि किसी दीगर व्यक्ति ने जानबूझ कर ‘आयोग’ को गलत सूचना देकर सदा के लिए रैगर जाति के स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त करवाया है। शायद ही रैगर समुदाय के किसी नेता या व्यक्ति ने ‘ कालेलकर आयोग’ के समक्ष रैगरों के आनुवांशिक पक्ष को पेश किया हो। इस उदासीनता के संबंध में इतिहासविज्ञ श्री रूपचंद जलुथरिया एम.ए.(इतिहास) ने लिखा हैं कि- “रैदास या चमारों कि जाति-उपजाति से हमारा(रैगर जाति का) कोई संबंध नहीं हैं। हमारे राजनेताओं कि कमजोरी के कारण अनुसूचित जाति कि सूची में 1956 हमारा नाम चमार के कोष्ठक में लिख दिया गया, जबकि 50 की सूची में बोला की तरह रैगर भी चमार से अलग ही लिखा हुआ था। अत: रैगर न तो रैदास्या है और न ही चमार है। यदि कोई रैगरों को रैदास्या या चमार बोलता है तो गलत है। हमारे रैगर भाइयों को भी चाहिए कि वे स्वयं भी ऐसा नहीं बोले और अन्य के बोलने पर विरोध करें । ब्यावर वाले अपनी बस्ती का नाम भी रैदासपुरा से रैगरपुरा बोले और लिखे। नगरपालिका मे संशोधन करायें….”।[6]

2- रैगरों के साथ पक्षपात-

          ‘कालेलकर आयोग’ ने सन् 1950 व 51 की अनुसूचियों की प्रविष्ठियों के विपरीत जाकर रैगर जातिनाम को सन् 1956 की अनुसूची में गलत स्थान पर अंकित करवाया है, जो पूर्णतया आपतिजनक है और उनका यह कृत्य पक्षपातपूर्ण भी लगता है, क्योंकि-

(1)- या तो ‘कालेलकर आयोग’ ने रैगरों के साथ पक्षपात किया है या उससे पक्षपात हो गया है  या उससे किसी ने छ्द्मरूप से रैगर जाति के विरुद्ध गलत काम करवा दिया हैं? यदि ‘आयोग’ सही हैं तो यह बात तो वो ही बता सकता है कि उसने सन् 1955 के बैरवा, बलाई, मेघवाल जातियों की पिछले कितने महीनों/वर्षों की सामाजिक, पेशागत, शैक्षिक और आर्थिक-प्रस्थिति को मानदंड व मापदंड बनाकर, उन्हें ‘चमार–संवर्ग’ की जातियों से अलग मानकर, उनके नाम स्वतंत्र क्रमांकों पर अंकित करवाये हैं और उक्त ‘आयोग’ ने किस ऐतिहासिक आनुवांशिकता के अंतर्गत रैगरों को चमार–संवर्ग की जाति माना है। वस्तुतः आयोग ने अवैधानिक कार्यवाही की है।

(2)- यदि ‘कालेलकर आयोग’ ने अपने विवेक से रैगर जाति की आनुवांशिकता का अध्ययन किया होता तो वह प्रथम तो ‘बोला’ को नये सिरे से एक स्वतंत्र जाति का संवैधानिक दर्जा नहीं दिलवाता, क्योंकि बोला लोग भी रैगर ही हैं। यदि ‘आयोग’ को बोला जातिनाम को भी स्वतंत्र जाति के रूप में अंकित करवाना सही लगा था तो उसका यह दायित्व भी था कि उसे ‘रैगर’ जातिनाम को भी उसी क्रमांक पर अंकित करवाना था, जिस क्रमांक पर उसने ‘बोला’ को दर्ज करवाने की सिफ़ारिश की थी। वस्तुतः‘आयोग’ ने बिना किसी गहन छान–बीन के ही, ‘रैगर’ और ‘बोला’ को दो अलग-अलग जातियाँ समझ लिया है, जबकि दोनों एक ही हैं और प्राचीन रघुवंशी क्षत्रियकुल की जाति है। 

(3)- ‘कालेलकर आयोग’ ने रैगर जातिनाम के संबंध में दुहरे मापदंड और मानदंड अपनाये हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1950 की सूची में बैरवा, बलाई, मेघवाल जातिनाम अंकित नहीं थे। साथ ही यह भी सही लगता है कि ‘कालेलकर आयोग’ ने अपने स्वविवेक से इनको सन् 1956 की सूची में नये सिरे से स्वतंत्र रूप से अलग–अलग क्रमांकों पर दर्ज नहीं करवाया था, बल्कि किसी निवेदन विशेष पर इन जातिनामों को इस तरह से स्वतंत्र क्रमांकों पर अंकित करवाया गया है। सोचनीय है कि ऐसा करवाने से पहले ‘कालेलकर आयोग’ ने यह नही देखा कि-

(क)- जो लोग अपना जातिनाम बैरवा, बलाई, मेघवाल दर्ज करवाना चाहते है, क्या उन लोगों ने अब तक आरक्षण को कोई फायदा नहीं लिया हैं?

(ख)- यदि लिया है तो किस जातिनाम से लिया है?

(ग)- यदि इन जातियों के लोगों ने सन् 1956 से पहले तक ‘चमार’ जातिनाम से आरक्षण का फायदा लिया है तो वह ‘आयोग’ परंपरागत जातिनाम ‘चमार’ के प्रतिस्थापक इन जातिनामों को ‘चमार-वर्ग’ से अलग स्वतंत्र रूप से कैसे अंकित करवा सकता है?

(घ)- जब सन् 1950 की सूची में रैगर जाति का नाम स्वतंत्र रूप से अलग क्रमांक पर दर्ज किया गया था तो सन् 1956 की सूची में भी उसके यथावत स्वतंत्र क्रमांक पर रखे जाने से किसी भी प्रकार की अनियमितता नहीं हो रही है।

(ङ)- रैगर जातिनाम को सन् 1956 की सूची में भी यथावत स्वतंत्र क्रमांक पर दर्ज होते रहने से किसी को कोई नुकसान भी होनेवाला नहीं है।

(4)- ‘कालेलकर आयोग’ ने रैगरों को ‘चमार–संवर्ग’ में शामिल करने से पूर्व इस बात पर विचार ही नहीं किया कि आम समुदाय हजारों वर्षों से रैगर को ‘रैगर’ ही कहकर संबोधित कर रहा है और राजस्व रिकॉर्ड में भी उनके लिये यही ‘रैगर’ जातिनाम दर्ज है और इसलिए राजस्थान के आम समुदाय के विद्वानों द्वारा सन् 1950 की अनुसूची में इनके लिए स्वतंत्र क्रमांक पर ‘रैगर’ जातिनाम ही अंकित किया गया था। साथ ही, तत्समय के आम लोग यह भी जानते थे कि ‘बोला’ भी ‘रैगर’ ही है, इसलिये सन् 1950 की अनुसूची में ‘बोला’ को अलग जातिनाम मे शामिल नहीं करवाया गया था । यह तो ‘कालेलकर आयोग’ ही बता सकता था कि उसने किस प्रयोजन व किस कारण से सन् 1956 की अनुसूची में नये सिरे से ‘बोला’ जाति को शामिल करवाया है और उसे स्वतंत्र संवैधानिक जाति का दर्जा क्यों दिलवाया और इसके विपरीत रैगर जातिनाम का गलत वर्गीकरण क्यों करवाया?

‘कालेलकर आयोग’ ने इस बात पर तो बिलकुल ही गौर ही नहीं किया कि वह जिन बैरवा, बलाई, मेघवाल जातिनामों को ‘चमार-संवर्ग’ से अलग स्वतंत्र क्रमांकों पर दर्ज करवाने जा रहा हैं, वे उनके नये जातिनाम हैं और भारत की आजादी तक भी इन जातियों के लोगों को आम समुदाय ‘चमार’ जातिनाम से संबोधित किया करता था और राजस्व रिकॉर्ड में भी इनके के लिये यही ‘चमार’ जातिनाम दर्ज था।

रैगर जाति की स्वतंत्र पहचान समाप्त कर देने के दुष्परिणाम

          ‘कालेलकर आयोग’ के कृत्यों से रैगर जाति के लिये ये दुष्परिणाम भी निकले हैं कि जनगणना विभाग द्वारा रैगर जाति की जनसंख्या स्वतंत्र रूप से प्रकाशित नहीं की जा रही है। रैगर जाति के अनपढ़ पूर्वज भी यह जानते थे कि रैगर[7] रघुवंशी क्षत्रिय हैं, परंतु उक्त आयोग की गलत सिफ़ारिश के कारण एक ऐसी सामाजिक मानसिकता का संचार हुआ कि खुद रैगरों के मानस पटल से भी यह बात धुंधली होकर मिट गई कि उनके पूर्वज रघुवंशी क्षत्रिय थे, उनमें एक विशेष अधोगामी सामाजिक हीनभावना पनप गई है कि रैगर जन्मजात शूद्र हैं, जिसको एक विचारधारा विशेष के रैगर नवयुवकों में तो बहुत आसानी से देखा जा सकता है। ये लोग कई असत्य परिकल्पनाओं के चक्रव्यूह में फंस गए हैं।

1- रैगर राजनीति का वजूद खत्म होना-

          यह स्पष्ट है कि ‘कालेलकर आयोग’ की सिफ़ारिश पर बनायी गई राजस्थान अनुसूचित जाति सूची, 1956 के ‘चमार-संवर्ग’ में कुछ जातिनाम दर्ज है। जनगणना विभाग द्वारा उन जातियों के लोगों की जनगणना के आंकड़ों को इकजाई कर प्रकाशित किया जा रहा हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रैगर जाति किसी भी राजनैतिक पार्टी या किसी विभाग के सामने यह दावा पेश नहीं कर सकती हैं कि उसकी वास्तविक जनसंख्या कितनी हैं? खुद जनगणना विभाग भी यह नहीं बता सकता है कि स्वतंत्र भारत के किस–किस वर्ष में रैगरों की कितनी-कितनी जनसंख्या थी और आज कितनी है? जबकि जनगणना विभाग ने बलाई, बैरवा, मेघवाल, खटीक, कोली, धोबी, नट, ढोली, सरगरा, कालबेलिया, बावरिया, बागरिया, धानका, मेहतर, सांसी आदि जातियों की जनसंख्या का प्रकाशन जातिवार किया हैं, जिसके बल पर ये जातियां राजनीति करती हैं और आम चुनावों के समय ये उनकी जनसंख्या के अनुपात में राजनैतिक पार्टियों से टिकिटों की मांग पेश करने में सक्षम होती है। जबकि रैगर जाति ऐसा नहीं कर सकती हैं, यदि कोई रैगर किसी राजनैतिक पार्टी के समक्ष अपनी जाति की जनसंख्या का आंकड़ा पेश भी करता है तो उसके पास उसके सही होने का कोई प्रमाण नहीं होता हैं। इस प्रकार ‘कालेलकर आयोग’ ने केवल रैगर जाति की सामाजिक-प्रस्थिति को ही धूमिल नहीं किया है, बल्कि उसकी सिफ़ारिश से बनी सन् 1956 की सूची के आधार पर जनगणना विभाग ने भी उसके रिकॉर्ड में रैगर जाति की वास्तविक जनसंख्या को गौण कर दिया है या मिटा दिया है। जनगणना विभाग द्वारा रैगर जाति की स्वतंत्र सांख्यिकी की पहचान को खत्म कर देने का ही यह दुष्परिणाम है कि राष्ट्रीय स्तर पर रैगरों का राजनैतिक वजूद धीरे-धीरे शून्य हो गया है। गत 30 वार्ष से कोई रैगर सांसद नहीं बना है।

यह केवल भ्रांति है कि चमार, मोची, जीनगर, रविदासिया, रामदासिया, रैदास, जटिया(जो अलवर जिले में आबाद हैं), जाटव(स. 1922 ईस्वी के बाद कई रैगर परिवार जाटव समुदाय में  शामिल हो गए थे, उनके वशज तक यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि उनके कुछ ही पीढ़ी पहले के पूर्वज रैगर थे) आदि नामों वाली जातियों को आम चुनाव में किसी पार्टी द्वारा टिकिट देते ही, रैगर जाति को भी राजनैतिक सहभागिता प्राप्त हो जाती है। क्योंकि रैगर जाति का बोला जाति के अलावा  निम्नवर्ग की किसी  भी अन्य जाति से कोई भी आनुवांशिक संबंध नहीं हैं।

2- रैगरों में बढ़ती हीनभावना-

         सामान्यतःकई रैगर लोग किन्ही विजातियों द्वारा उन पर थोपी गयी अधोगामी बातों को बिना सोचे-समझे सही समझ बैठते है। वे ऐसी बातों का सत्यापन भी नहीं करते है और यदि कोई उनको समझाने की कोशिश करता है तो सामान्यतः प्रयास विफल ही जाता है। ‘कालेलकर आयोग‘ की सिफ़ारिश से भी एक प्रकार से रैगर जाति पर एक अधोगामी मानसिकता थोपी दी गयी है। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि हर कोई रैगर भाई यह जानता हो कि उसके पूर्वज रघुवंशी(सूर्यवंशी) क्षत्रिय थे, सन् 1891 ईस्वी तक भी रैगरों की सामाजिक-प्रस्थिति आज की तुलना में बहुत अच्छी थी और उनके सभी संस्कार छन्याती ब्राह्मण करवाते थे और ‘कालेलकर आयोग‘ उनके जातिनाम का गलत वर्गीकरण किया है।  अब तो एक विचारधारा के कारण कई रैगरों की मानसिकता तो इतनी गिर गई है कि वे रैगर जाति की वर्तमान सामाजिक-प्रस्थिति को शाश्वत अमझ बैठे हैं और ऐसे में, उनको वास्तविकता का ज्ञान कराना बहुत मुश्किल हो गया है। यह भी विचारणीय है कि अपने पूर्वजों की वास्तविक सामाजिक-प्रस्थिति से अनभिज्ञ कोई रैगर नवयुवक, जब भी सन् 1956 की अनुसूची का अवलोकन करता है तो वह प्रथम–दृष्ट्या ही इस बात को सही समझ लेता है कि रैगर जन्मजात ‘चमार-संवर्ग’ की जाति है और उसकी मति(बुद्धि) इस सीमा तक भ्रमित व सीमित हो जाती है कि उसको इस बात पर गौर करने का मौका ही नहीं मिलता है कि किसी की वर्तमान आजीविका से उसके बाप-दादाओं का वर्ण निर्धारित नहीं होता है। बल्कि वह तो हीनभावना के गहरे समुद्र के किसी भँवर में फंसता ही जाता है। उसकी तर्क शक्ति भी इतनी कमजोर हो जाती है कि वह यह सोच ही नहीं सकता है कि यदि ‘चमार’ सम्बोधन ईज्जतमय होता तो जाति विशेष के लोग उसके स्थान पर नये जाति नहीं रखे होते।

जब जाति विशेष के लोग इस बात के लिए तैयार ही नहीं हैं कि उनको कोई ‘चमार’ जाति नाम से संबोधित करे तो फिर ‘कालेलकर आयोग‘ ने रैगरों का गलत जातिकारण क्यों किया?

 

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संदर्भ

[1]- अजमेर से प्रकाशित साप्ताहिक “आवाज”, वर्ष 2 अंक 42 में दिनांक 28 जुलाई, सन् 1941 को जारी प्रमाणपत्र

राजपूताना  प्रांतीय हिन्दू महासभा अजमेर, (रजि.) द्वारा समर्पित प्रमाणपत्र
ता. 28 जुलाई, सन् 1941 
यह प्रमाणित किया जाता है कि शास्त्रों, इतिहासों और प्राचीन ग्रन्थों के अनुशीलन से यह सिद्ध होता है कि यह ’रैगर’ जाति ‘गर’ क्षत्रियों  से उत्पन्न हुई है। अतः सब हिन्दू(आर्य) नर-नारियों से निवेदन हैं कि वे इनके साथ क्षत्रियों के समान पूर्ण व्यवहार करे।

………..श्री चिरंजीलाल बोकोलिया व राजेंद्रप्रसाद गाड़ेगावलिया::रैगर कौन और क्यों?, 1967; पृष्ठ संख्या 31


[2]- यह आदेश The Gazette of India में दिनांक 6 June, 1936 को प्रकाशित हुआ।


[3]- The British India Census, 1891.


  [4]- यह आदेश The Gazette of India में दिनांक 11 August, 1950  को प्रकाशित हुआ।

[5]- यह आदेश The Gazette of India में दिनांक 20 september,1951 को प्रकाशित हुआ।


[6]- श्री रूपचंद जलुथरिया:: रैगर जाति का इतिहास; पृष्ठ संख्या 19.


[7]   1-रघुवंशी क्षत्रियों का एक समूह →रघु→रघ→ रग→ रगर →रहगर →रेहगर→  रैगर/रेगर।

2- महाकवि राजशेखर (9 वीं सदी ईस्वी)::रघुकुल चिंतामणि-

रघुवंश की  जगत में, शाखा भई दस पाँच।
गुज्ज  रग अभी शक भिन्न-भिन्न सतार्थ बांच।।

इस पद में गुज्ज, रग, अभी, शक शब्द क्रमशः गुज्जर (गुर्जरप्रतीहार वंश), रगर(रैगर वंश), अभीर(अहीर), शक (मध्य एशिया का क्षत्रिय वंश) के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
अर्थात  रगर(रैगर) वंश  रघुवंशी क्षत्रियों की  15 मुख्य शाखाओं में शामिल हैं ।
…….. स्वामी जीवारामजी::श्री रैगर जाति वर्णप्रकाश गोत्र शिक्षा, वि.सं.1998; पृष्ठ संख्या 9-10

 

 

One thought on “काका कालेलकर आयोग”

  1. आप सभी बता तो रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा यह समाज के बारे में लोगों को जानकारी क्यों नहीं हे या तो आप समझा नहीं चाहते अगर यह सत्य है तो आप लोगों ने लोगों को रैगर समाज के बारे में बताने के लिए लोगों को जागरूकता फैलाने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए आज इतने सारे रैगर समाज के संगठन महा संगठन बने हुए हैं आप वहां जाकर क्यों नहीं बताते क्या सिर्फ एक लेख लिखने से ही आप लोगों को बता सकते हैं अपने समाज में पढ़े-लिखे लोग की कमी होने की वजह से ही आज बहुत ही कम लोग सोशल नेटवर्किंग का यूज करते हैं मैं आपसे रिक्वेस्ट करूंगा प्लीज आप जहां भी अपनी जितनी भी सभाएं होती हैं वहां जाकर रैगर जाति का इतिहास बताएं और जो किताबें हैं उनको कम से कम दामों में कम से कम मूल्य में लोगों को पहुंचाएं । मैं तो फस गया पूरी तरह कि हम अंबेडकर जी को माने या फिर रैगर समाज के देवी देवताओं को मैंने या फिर हिंदू माने जो बहुत बड़ा कंफ्यूजन है समझ नहीं आ रहा किसी क्या गड़बड़ हो गया हमें अपनी जाति के बारे में ही नहीं पता कई लोगों को धर्म बौद्ध धर्म ज्वाइन कर लो कई लोग बोलते r.s.s. ज्वाइन कर लो

    मैं आपसे निवेदन करता हूं सर जितनी भी रैगर समाज की जो संगठन बने हुए हैं आप वहां जाएं और उनको इस बात से अवगत कराएं कि हमारा इतिहास यह है नहीं के विद्यार्थी हूं मैंने कई जगह कई संगठनों में गया मैंने वहां भी देखा कि अपने रैगर समाज के इतिहास के बारे में कोई भी स्पीच नहीं करता मैंने कई बार कोशिश की थी कि मैं कैसे लूं कैसे रोके परंतु मेरी स्टडी के चलते समय नहीं निकाल पाया मैं आपसे रिक्वेस्ट करूंगा मैं आपसे रिक्वेस्ट करूंगा सर प्लीज।
    आज मैं अपने कह देता हूं जहां मैं रहता हूं वहां पर किसी भी व्यक्ति को रेगर जाति का इतिहास नहीं पता का इतिहास नहीं पता

    सर मैं आपसे बात करना चाहूंगा मैंने आपको मेरी मेल आईडी सेंड की है पर आप अपना मोबाइल नंबर जरूर सेंड कीजिएगा मुझे भी अपनी इतिहास के बारे में जानने का हक है

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