महाभारत कालीन रग राजवंश:-

          महा भारत काल में रग अर्थात रैगर रघुवंशी क्षत्रियों का अस्तित्व था । भीष्मपर्व महाभारत(हिन्दी अनुवाद, गीताप्रेस, गोरखपुर) के श्लोक(6, 9, 54) में रग नामक क्षत्रियवंश का उल्लेख आया है। परंतु कुछ इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि इस श्लोक में उरग जनजाति का वर्णन किया गया है।

पश्चिमी इतिहासकारों ने उरग नगर की भौगोलिक स्थिति को गांधार देश के उत्तर में चिन्हित की है । उनका यह भी कहना है कि उरग लोग इथोपिया(अफ्रीका) से चलकर, पहले बलूचिस्तान क्षेत्र में आये, फिर वहां से निकलकर, पूरे विश्व में फ़ैल गये। उनका एक समूह तत्कालीन काश्मीर देश के पश्चिम में स्थित भूभाग में आबाद हो गया, महाभारतकाल में वहाँ का राजा रोचमान थे। परंतु पश्चिमी इतिहासकारों के द्वारा यह नहीं बताया गया कि इथोपिया के उरग लोगों के पूर्वज कौन थे और वहाँ पर वे कहाँ से आए थे ? उन्होंने तो इस तथ्य पर भी गंभीरता के साथ विचार नहीं किया कि महाभारत काव्य के दो श्लोकों को छोड़कर, अन्य अधिकांश श्लोकों में “उरग” शब्द उसकी विभिन्न विभक्तियों में इच्छाधारी नाग जाति के लिए अन्य अर्द्ध मनुष्य जनजातियों के साथ प्रयुक्त हुआ है और कुछ श्लोकों में यह शब्द वनचर सर्प के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। परंतु सभापर्व महाभारत के श्लोक(2, 27, 19) में मुद्रित/दृष्टिगोचर “उरगावासिन”  में “उरगा” शब्द “उरग(नाग/सर्प)” शब्द की कोई विभक्ति नहीं है, बल्कि यह एक स्थानवाचक शब्द है, जिसकी वर्तनी अशुद्ध लगती है ।

महाभारत ग्रंथ का मूल शब्द “उरसावासिनम्” है ,  न  कि “उरगावासिनम्” है

          सभापर्व महाभारत के वर्तमान संस्कारण के श्लोक(2, 27, 19) में “उरगावासिनम्” शब्द इस प्रकार से मुद्रित है –

अभिसारीम् ततो रम्याम् विजिग्ये कुरुनन्दनः।
उरगावासिनम् चैव रोचमानम् रणेऽजयत्॥ मभा. 02, 27, 19 ॥

वस्तुतः आर्यावर्त में उरग नामक कोई जनजाति ही नहीं थी, बल्कि इसका आभासी आगमन हुआ है, जिसकी जड़ उक्त सभापर्व महाभारत के श्लोक(2, 27, 19) में दिखती है। इस सम्बन्ध  में उल्लेखनीय है कि प्राचीन समय में ग्रंथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कण्ठस्थ करवाए जाते थे और उसी के परिणाम स्वरूप किसी स्तर पर इस श्लोक में “उरसावासिन” शब्द के स्थान पर “उरगावासिन” का आगमन हो गया था और इस रूप में वह स्थायी ध्वनि हो गया, जिससे इतिहासकारों ने यह मान लिया कि उरगा नामक देश था तथा रोचमान वहाँ का राजा था, जिसे अर्जुन ने पराजित किया था। इस प्रकार से “उरगा” जनजाति की अवधारणा उत्पन्न कर दी गई है, परंतु पश्चिमी इतिहासकारों ने इस तथ्य पर भी विचार ही नहीं किया कि जिस स्थान पर उन्होंने उरगा देश माना है, द्रोणपर्व महाभारत के श्लोक(7, 11,16) के अनुसार वह उरसा क्षत्रियों का देश था, जिसे अर्जुन से पहले श्रीकृष्ण ने भी पराजित किया था, शायद रोचमान निरंकुश हो गया था, इललिए अर्जुन द्वारा उसको पुनः नतमस्त्क करना पड़ा ।

          द्रोणपर्व महाभारत  के वर्तमान संस्कारण के श्लोक(07, 11, 16) में उरसा राजवंश के राज्य का उल्लेख इस प्रकार से मुद्रित है –

आवन्त्यान् दक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान्। 
 काश्मीरकानौरसिकान् [1] पिशाचांश्चसमुद्गलान् ॥ मभा. 07, 11, 16॥

शायद द्रोणपर्व के इस तथ्य के सामने आने के बाद,  ड़ाक्टर स्टीन आदि कई पश्चिमी विद्वान कहते हैं कि उरसा और उरगा एक ही हैं और वो ही वर्तमान पाकिस्तान का हज़ारा भूभाग है , जबकि केवल यही सही है कि उरसा ही हज़ारा है। पश्चिमी विद्वानों के द्वारा उरसा और उरगा को एक बताने से तो ऐसा लगता है कि उनका यह कथन पूर्व में पैदा कर ली गई उरगा नामक गलत अवधारणा को सही ठहराना मात्र है। वस्तुतः उरसा और उरगा एक हो ही नहीं सकते हैं, क्योंकि पश्चिमी विद्वानों के द्वारा उरगा को नागकुल का होना परिकल्पित किया गया है, जबकि उरसा सूर्यकुल का राजवंश था, जिनके एक समूह के वंशज आज उरसरकिया वंश के रैगर रघुवंशी कहलाते हैं, अर्थात दो अलग अलग कुलनामों को एक समझना प्रथम-दृष्टया ही गलत है। अतः यदि कहीं कोई उरगा जनजाति थी तो भी वह आर्यावर्त के उरसा वंश से भिन्न और कोई अन्य जनजाति थी। अर्थात काश्मीर के पश्चिम में स्थित जिस भूभाग को उरगा देश होना परिकल्पित किया गया है, वह सूर्यवंशी उरसार क्षत्रियों का उरसा देश था,  जिसके लगते पश्चिम में अभिसार क्षत्रियों का राज्य था।

 

महाभारत ग्रंथ का मूल शब्द “वातजामरथरगाः” है ,न कि “वातजामरथोरगाः”

           भीष्मपर्व महाभारत  के वर्तमान संस्कारण के श्लोक(6, 9, 54) में “वातजामरथोरगाः” शब्द इस प्रकार से मुद्रित है  –

अभिसारा उलूताश्च शैवाला वाल्हिकाः तथा।
 दार्वी छ वानवा दर्वा वातजामरथोरगाः॥ मभा. 06, 9, 54 ॥

         वस्तुतः महाभारत ग्रंथ में नाग जनजाति से भिन्न किसी उरग/उरगा नामक जनजाति का उल्लेख नहीं आया है। बल्कि विद्वानों ने सभापर्व महाभारत के श्लोक(2, 27, 19) में दृष्टिगोचर उरगा के आभासी आगमन को सही समझा और बिना किसी गहन छानबीन के ही उरगा जनजाति का अस्तित्व मानकर भीष्मपर्व महाभारत के श्लोक(6, 9, 54) में दृष्टिगोचर “वातजामरथोरगाः” शब्द का संधिविच्छेद विसर्गसंधि के नियम से (वात+जाम+ रथः+ रगाः) न करके, स्वर संधि नियम से करके, यह परिकल्पित कर लिया है कि इस शब्द में उरगा(वातज +अमरथ + उरगाः) वंश का नाम आया है। जबकि वातज और अमरथ नामक किसी अर्द्ध या पूर्ण मनुष्य जनजातियों का अस्तित्व प्रमाणित ही नहीं होता है। जिसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि वर्तमान जाट समुदाय में महाभारतकाल के सैंकड़ों वंशों के वंशज विद्यमान हैं। जाटों में वात, जाम, रथ, रग(रगी) गोत्रनाम तो हैं , परंतु वातज, अमरथ और उरगा जाट गोत्र नहीं हैं। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि महाभारत ग्रंथ के श्लोक(6, 9, 54) में रग क्षत्रियों के ही रग राजनगर का उल्लेख आया है, न कि उरग नगर का ।

 

कुछ आधुनिक इतिहासकारों द्वारा उरग के अस्तित्व को नकारना-

     1- लक्ष्मण बुरड़क – जाट जाति में जन्में इतिहासकार लक्ष्मण बुरड़क ने “वातजामरथोरगाः” शब्द के दो हिज्जे करके लिखा है कि इस शब्द में वातजाम और रदोरग वंश का नाम समावेश है, उन्होंने महाभारतयुद्ध किया था। परंतु श्री बुरड़क का प्रतिपादन सही नहीं लगता है, क्योंकि इस शब्द का संधि विच्छेद “वातजामरथोरगाः = वात+जाम+ रथः+ रगाः ही ग्राह्य है, न कि वातजाम और रदोरग।

     2- श्री एच. एच. विल्सन-  देखा गया है कि मिश्रित शब्द के आंतरिक वर्णों में आगे चलकर परिवर्तन आ  जाता है, जिसे अपभ्रंशन कहा जाता है। परंतु उसका वो ही संधि विच्छेद सार्थक होता है, यदि उससे प्राप्त शब्दों का सार्थक अस्तित्व हो? विष्णु पुराण के अंग्रेज़ अनुवादक श्री एच. एच. विल्सन ने “वातजामरथोरगाः” शब्द का संधि विच्छेद ही नहीं किया है । संभव है कि या तो श्री विल्सन ने “वातजामरथोरगाः= वातज +अमरथ + उरगाः को स्वीकार ही नहीं किया अथवा उन्हें “वातजामरथोरगाः” शब्द की आंतरिक वर्तनी ही सही नहीं लगी थी, क्योंकि विभिन्न आयामों एवं प्रमाणों से ऐसा लगता है कि महाभारत ग्रंथ का मूल शब्द वातजामरथरगाः(वात+जाम+ रथ+ रगाः) है, जो किसी स्तर पर “वातजामरथोरगाः” हो गया और उस तथ्य पर विचार किए बिना ही उसका गलत संधिविच्छेद किया जा रहा। इस आंतरिक वर्तनी  दोष की पुष्टि इस बात से भी होती है कि प्राचीन समय में ग्रंथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को कण्ठस्थ करवाए जाते थे और प्रबलता है कि उसी के परिणाम स्वरूप किसी स्तर पर इस श्लोक में “वातजामरथरगाः” शब्द के स्थान पर “वातजामरथोरगाः” ध्वनित होकर स्थायी हो गया ।


संदर्भ-

[1]–  1. काश्मीरकानौरसिकान् = काश्मीरकान् + औरसिकान्
         2. उरसा + इक(वंशवाचक प्रत्यय) → औरस + इक = औरसिक(उरसा क्षत्रियों का देश या उनकी शाखा)
         3. औरसिकान् = संस्कृत अकारान्ती शब्द ‘औरसिक’ की द्वितीय विभक्ति का बहुवचन है, जिसका अर्थ औरसिक वंश के क्षत्रिय या औरसिक देश के निवासी  है।

 

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