भ्रांति है कि बाबा रामदेवजी बलाई (मेघवाल) थे, जबकि वे तोमर राजपूत थे।

भ्रांति है कि रैगर जाति का सामाजिक, प्रशासनिक और राजनैतिक कॉम्पिटिशन ब्राह्मण, राजपूत व बनियों से है, जबकि वास्तविक कॉम्पिटिशन SC जातियों से है। 

भ्रांति है कि रैदासजी रैगर थे, जबकि वे बनारस के चमार समुदाय के थे और रैगर ईसा पूर्व के राजपूताना के मूलनिवासी हैं ।

रैगरों को उक्त भ्रांतियों को लेकर बुरा नहीं मानना चाहिए, बल्कि उनके लिए यह  एक कड़वा सच है कि वे नकारात्मक और अधोगामी बात को जल्दी ग्रहण करते हैं और उनकी जाँच पड़ताल किये बिना ही, उसे सत्य मान लेते हैं और अपने के पूर्वजों को भी उन जैसा ही समझने लगते हैं। ऐसी आदतों, मानसिकताओं और भ्रांतियों की संख्या खूब है। उनमें से यहां पर केवल तीन भ्रांतियों का विवेचन किया जा रहा है। अर्थात्-


(1)- प्रथम भ्रान्ति – बाबा रामदेवजी बलाई(मेघवाल) थे , जो गलत है, क्योंकि वास्तविकता यह है कि –
बलाई(वर्तमान मेघवाल) जाति में जन्में साधु रामप्रकाश ने “ब्रह्म-पुराण” नामक एक पुस्तिका लिखी थी, जिसमें उनके द्वारा मनमर्जी से यह प्रतिपादित किया गया था कि रामदेवजी मेघवाल जाति के थे, जबकि उस समय मेघवाल शब्द  से कोई जातिनाम ही नहीं था । इस प्रतिपादन का तोमर राजपूतों के द्वारा विरोध किया गया था, जिसका विस्तृत विवेचन “Is God an Untouchable? A Case of Caste Conflict in Rajasthan By Dominique-Sila Khan” में किया गया है। उसके अनुसार मेघवालों और तोमर राजपूतों के मध्य एक झगड़ा चला, जिसमें रैगरों ने मेघवालों का साथ दिया था। देखा गया है कि रैगर कई मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं  और नुकसान उठाते हैं । सुना गया है कि उस तोमर-मेघवाल विवाद और तनातनी को लेकर रैगरों द्वारा किए गए हस्तक्षेप का सीधा प्रभाव रामदेवरा रैगर धर्मशाला के निर्माण पर भी पड़ा था। उस झगड़े के दौरान सर्वप्रथम रामदेवरा के मुखिया राव रिड़मलसिंह ने 11 दिसंबर, 1978 को साधु रामप्रकाश को एक पत्र लिखा कि आपकी सूचना(ब्रह्म पुराण) से रामदेवजी और हमारी मानहानि हुई है।  मामला अदालत तक तो नहीं गया था, लेकिन उस तनातनी में साधु रामप्रकाश ने “पोल में ढोल” नामक एक दूसरी पुस्तिका लिखी, जिसमें उसने उसके “ब्रह्म-पुराण” की बात को पलटकर, यह कह दिया था कि जहाँ रामदेवजी की समाधि मानकर, पूजा जाता है, वह तो कोई मुस्लिम कब्र है। उस बात को लेकर आज के मेघवाल समुदाय की रामदेवजी के प्रति मान्यता में क्या परिवर्तन आया है? उसके विश्लेषण की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन कुछ परिवर्तन आया भी लगता है, जैसे गांव बिचून(जयपुर) में स्थित बलाइयों के रामदेवजी के मंदिर का नामकरण बदलकर, बलाई जाति में जन्में ऋषि के नाम पर कर दिया गया है। उस ऋषि ने उसी मंदिर के परिसर में समाधि ली थी।
Mr. Khan ने  ढेढ/ बलाई/ मेघवाल जाति शब्दों को लेकर कुछ भी लिखा है, परंतु उसने बिना किसी गहन छानबीन के ही रैगर जाति की वर्तमान सामाजिक और आर्थिक दशा को शाश्वत समझ लिया और उसके आधार पर उसने  रामदेवजी के जीवन काल से ही, उनसे रैगरों का सम्बन्ध जोड़ दिया , जो गलत है, क्योंकि उस समय के रैगर सामान्य वर्ग के रघुवंशी क्षत्रिय थे। वस्तुतः रामदेवजी महाराज के प्रति रैगर की आस्था का जन्म सन् 1891 ईस्वी के बाद हुआ है । यदि इसके पहले हो गया होता तो इसका उल्लेख “मारवाड़ जनगणना रिपोर्ट, 1891” में भी होता। जबकि उसमें  रैगरों को वैष्णव बताया गया है, जो  सालिग्राम की पूजा करते थे। रैगर जाति के सभी धार्मिक कार्य छन्याता ब्राह्मण करवाते थे ।
वस्तुतः रैगरों में बाबा रामदेवजी महाराज के प्रति आस्था पुरानी नहीं है, बल्कि भारत आजादी के आस-पास ज्यादा बढ़ी है। अब तो गांव-गांव की रैगर बस्तियों में बाबा के मंदिर बन गए हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई रैगरों की यह गलत मानसिकता बन गयी है कि रामदेवजी बलाई जाति के थे, यह बात दाबी जबान में कई रैगरों से सुनी गई है। जिसके प्रमाण में  वे साधु रामप्रकाश की “ब्रह्म-पुराण ” नामक कृति पेश करते हैं। यदि रैगरों को साधु रामप्रकाश की दूसरी कृति  “ढोल में पोल”  पढने को मिली  होती तो शायद रैगरों  यह भ्रांति नहीं होती। वस्तुतः जब भी कोई रैगर रामदेवरा जाता है, तब वह “ब्रह्म-पुराण” नामक किताब को ले लाता है। उसी को पढ़कर यह कहता-फिरता है कि रामदेवजी मेघवाल थे। जबकि “ढोल में पोल” नामक दूसरी पुस्तिका सार्वजानिक तौर पर उपलब्ध नहीं है। ऐसा क्यों है? इस बात को रैगर लोगों को समझना चाहिए।
हम इस बात के विरोधी नहीं है कि रैगर लोग रामदेवजी को मानते हैं। लेकिन रैगरों की यह मानसिकता गलत है कि रामदेवजी मेघवाल थे और वे निम्न जाति के देव हैं और रैगर एक निम्न जाति हैं, इसलिए उनके लिए भी रामदेवजी  पूजनीय हो गए हैं। जबकि कम बुद्धिवाला भी यह सोच सकता है कि यदि रामदेवजी बलाई होते तो क्या उस समय के मारवाड़ के खूंखार राजपूत रामदेवजी को ऐसे सुसज्जित लकदक घोड़े पर बैठकर, सार्वजनिक रूप में घूमने देते? कदापि घूमने नहीं देते। उनको घोड़े पर भी नहीं बैठने देते । यह एक प्रमाणित तथ्य है कि रामदेवजी तोमर राजपूत थे और वे सर्वजातियों के लिए पूजनीय है।

(2)- द्वितीय भ्रान्ति – रैगर जाति का सामाजिक, प्रशासनिक और राजनैतिक कॉम्पिटिशन ब्राह्मण, बनियों से है, जो सही नहीं हैं, क्योंकि-
वास्तविकता यह है कि रैगरों का असली सामाजिक, राजनैतिक और प्रशासनिक कॉम्पिटिशन तो बैरवा, मेघवाल, जाटव, खटीक, कोली, बलाई, भाम्भी, चमार, नट, सांसी, मेहतरआदि SC वर्ग की जातियों से है।  बिना विवेक इस्तेमाल किए ही कई रैगर भाई असंगत रूप से रैगर जाति की सभाओं में यह बोलते रहते हैं कि हमारे आरक्षण का फायदा ब्राह्मण, बनियां, राजपूत उठा रहे हैं। वे रैगर इस बात पर विचार ही नहीं करते हैं कि वे तो हर क्षेत्र में SC वर्ग की उक्त जातियों से भी काफी पीछे चल रहे हैं, इसलिए यह संभव नहीं है कि रैगर समुदाय कभी भी SC वर्ग से अलग होकर, सामान्यवर्ग की बराबरी कर पायेगा। यदि बड़बोलेपन की यही हालात रहे तो अगले दस वर्षों में रैगर लोगों से मेहतर भाई भी आगे बढ़ जायेंगे, उनकी राजनैतिक स्थिति तो आज भी रैगरों से बेहतर है। वस्तुतः रैगरों को गुमराह किया जाकर गलत रास्ते चलाया जा रहा है । किसी का उन्नत होना अच्छी बात है। लेकिन रैगरों का गिरना या उनको गिराना तो गलत ही होगा।

(3)- तृतीय भ्रान्ति – रैदासजी रैगर थे, जो सही नहीं हैं, क्योंकि-
रैगर ईसा पूर्व के सामान्य वर्ग के रघुवंशी क्षत्रिय हैं। किसी ने जान बूझकर एक मनगढ़ंत कहानी के जरिये रैगर जाति को रैदास जी के साथ जोड़ने की कुचेष्टा की है, जिसका वृतांत यह है कि भक्तिकाल(मध्य मुस्लिमयुग) में कबीरजी, रैदासजी, पीपाजी, नामदेवजी, सेनभक्त आदि अनेक संत हुए थे, जो अलग-अलग समुदायों में जन्में थे और उनका सभी जातियों द्वारा आदर किया जाता था। परन्तु आगे चलकर उनकी आस्था जातिगत सीमाओं में कैद हो गयी और 19 वीं सदी के आते-आते कई जातियों के नाम उनके भक्तिकालीन संतों के नाम पर प्रचलित हो गये। जैसाकि दर्जी नामा हो गए, नाई सेन हो गये, जुलाहा कबीर हो गए तथा माली सैनी हो गये, आदि। उस प्रचलन को देखकर, कुछ मनचलों के दिमाग में यह बात आयी कि क्यों नहीं, रैदासजी को राजपूताना के रैगर-चमारों से जोड़ दिया जाये और लगभग 150 वर्ष पहले मारवाड़-मेरवाड़ा-मेवाड़ के संयुक्त सीमांत क्षेत्र में एक कहानी प्रचलित कर दी गयी कि भक्त रैदासजी के दो पत्नियां थी। एक का पुत्र भक्त था, जिसके वंशज रैगर हैं। जबकि उनकी दूसरी पत्नी के पुत्र ने चमड़े का काम किया था, अतः उसकी संतान चमार कहलायी हैं। इस कहानी का उल्लेख मारवाड़ रियासत की जनगणना रिपोर्ट, 1891 में भी किया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि रैदासजी बनारस के परम्परागत चमार जाति के जैसवाल गोत्र के थे और उनके एक ही पत्नी लोनाबाई थी, जिनके केवल एक ही पुत्र था, जिनका नाम विजयदास था, जिसके वंशज परंपरागत रूप से चमार कहलाते रहे। यह भी उल्लेखनीय है कि रैगर समुदाय में कभी भी जैसवाल नामक गोत्र प्रचलित नहीं रहा है।अर्थात्  रैगर जाति का रैदास जी से किसी भी प्रकार का आनुवांशिक संबंध नहीं  हैं ।  रैगर मूल से ही राजपूताना (राजस्थान) के  निवासी है और उनके गोत्रवंश नामों पर सैंकड़ों गांवों के नाम है, जो इस बात का प्रमाण है कि एक समय रैगर सामान्य वर्ग के थे। राजस्थान से बाहर जो भी रैगर परिवार रहते हैं, वे स्वयं या उनके दादा-परदादा कुछ समय पूर्व राजपूताना (राजस्थान) से ही गये हैं ।  
यद्यपि उक्त कहानी एक  मनगढ़ंत रचना है, परंतु इसके तार्किक विश्लेषण से यह बात सामने आती है  कि यह अप्रत्यक्ष रूप से इस सच्चाई को उजागर करती है कि  रैगर जाति के लोग चमड़े का काम नहीं करते थे। परंतु अधोगामी सोचवाले रैगर को यह बात नहीं दिखेगी, वो तो तुरंत ही यह स्वीकार कर लेगा की रैगर जाति रैदास की वंशज है, जबकि इस रचना का एक पक्ष इस बात का  पुख्ता प्रमाण है कि सन् 1891 ईस्वी में रैगर जाति की सामाजिक प्रस्थिति आज की तुलना में बेहतर थी। अतः यदि  बाबा रामदेवजी महाराज के काल की बात करें तो यह सही  है कि उस समय रैगर समुदाय उच्च सामान्य श्रेणी का  था।
यह भी देखा गया है कि राजपूताना के परम्परागत चमार समुदाय के इतिहासकारों ने  उस मनगढ़ंत कहानी के संबंध में किसी भी प्रकार का विचार नहीं किया है, बल्कि उनके समुदाय ने अपने को रैदासजी से दूर रखने का प्रयास किया है, जिसकी पुष्टि इस बात से होती है कि शायद ही, आज उनके आम वंशजों के ड्राईंग रूम में रैदासजी की तस्वीर टंगी मिले। यह कहना गलता है कि रैदासजी का आदर नहीं किया जाए, परंतु रैगरों द्वारा उनको अपना वंशपिता मानना गलत  है और उनका ऐसा मानना विकृति और अधोगामी मानसिकता का परिचायक है ।  ऐसे रैगरों को अपनी इस अज्ञानता को दूर करने के लिए यह विचार करना चाहिए कि आज तक भी सामान्यवर्ग के किसी भी इतिहासकार ने यह प्रमाणित नहीं किया है कि रैगर रैदासजी के वंशज हैं, वे केवल यह लिखते हैं कि रैगर ऐसा मानते हैं कि रैदासजी रैगर थे। अतः आवश्यकता इस बात की है कि रैगर लोगों को किसी के बहकावे में आकर किसी गलत भावना या विचारधारा में बहने के स्थान पर वास्तविकता को समझना चाहिए कि रैगर जाति का रैदास जी किसी भी प्रकार का आनुवांशिक संबंध नहीं  हैं ।

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