पृष्ठभूमि

        भारत की आज़ादी के बाद कई रैगरों द्वारा अज्ञान(गलत बात) को ज्ञान(सही बात) समझ लेने के कारण उनकी सोच अधोगामी हो गई है। जबकि उससे पहले के अनपढ़ रैगर उर्ध्वगामी सोच के थे। वे अपने को जन्मजात रघुवंशी क्षत्रिय बतलाते थे।

श्री रूपचन्द जी जलूथरियाजी ने बिना किसी ऐतिहासिक शोध के ही, हर उस रैगर के लताड़ लगाई, जिसने रैगरों को सूर्यवंशी, सगरवंशी या रघुवंशी कहा था। श्री जलूथरियाजी की सोच कैसी भी थी, उन जैसे विद्वान को अधोगामी सोच से शासित होने से बचना था।

उर्ध्वगामी सोच के आधुनिक प्रणेता स्वामी जीवारामजी महाराज-

         स्वामीजी ने रैगरों में उर्ध्वगामी सोच को पुनः विकसित करने का प्रयास किया था। इसके लिए उन्होंने एक वर्ष तक काशी नगरी में रहकर, रैगरॉ के पूर्वजों की जानकारी प्राप्त की और 1940-41 में “श्री रैगर जाति वर्ण प्रकाश गोत्र शिक्षा ” नामक रैगर जाति का इतिहास लिखा, जिसमें उन्होंने यह स्थापित किया है कि रैगर समुदाय जन्मजात रघुवंशी क्षत्रिय थे। इसके प्रमाण में उन्होंने उक्त ग्रंथ में 9 वीं सदी ईस्वी के महाकवि राजशेखर के ग्रंथ “रघुकुल चिन्तामणि” का एक दोहा पेश किया है कि-
रघुवंस की जगत में, शाखा भई दस पांच(10 + 5 = 15)।
गुज्ज रग अभी शक, भिन्न भिन्न सतार्थ बांच ।।
स्पष्टतया इस दोहे में गुज्ज, रग, अभी शब्द क्रमशः गुज्जर(गुर्जर), रगर(रैगर), अभीर(अहीर) के लिये प्रयुक्त हुए हैं, जिससे यह प्रमाणित है कि रैगर रघुवंशी क्षत्रियों की 15 प्रमुख शाखाओं में से एक प्रमुख शाखा है।

रैगरों में अधोगामी सोच की सच्चाई का एक घृणित नमूना

          देखा गया है कि रैगर विद्वान शुरुआत में बहुत अच्छी बात करते हैं। लेकिन अंत में अधोगामी सोच के शिकार हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, दिल्ली निवासी श्विद्वान श्री चिरंजीलालजी बोकोलिया और श्री राजेन्द्रप्रसादजी गाड़ेगावलिया की कृति “रैगर कौन और क्यों?” में रैगरों को पहले पहाड़ पर बैठा दिया गया है और अंत में उनके द्वारा उक्त दोहे के मूल शब्द ‘रग’ व ‘गुज्ज’ के स्थान पर ‘रंग’और ‘गुञ्ज(गुंज)’ शब्द कल्पित कर लिया गया और यह स्थापित कर दिया गया कि “रघुकुलचिंतामणि” के दोहे में यदि गुञ्ज (गुंज) शब्द गूजरों के लिये आया है तो रंग शब्द चमड़ा रंगनेवालों (रैगरों) के लिये आया है। स्पष्टतः बोकोलियाजी और गाड़ेगावलियाजी अधोगामी सोच से शासित हो गए और उन्होंने रैगरों को गर्त में गिरा दिया। उन्होंने अपनी सोच को इतना नीचे झुका लिया कि उनको केवल रैगरों के द्वारा किये जा रहा वर्तमान कर्म ही दिखाई दिया। उन्होंने इस प्रश्न पर विचार ही नहीं किया कि क्या गुर्जर प्रतीहारवंश के महाराजा महेन्द्रपाल प्रथम(885-910 ईस्वी) के दरबार के ब्राह्मण महाकवि राजशेखर महाराजा के गुर्जरवंश के साथ किसी चमड़ा रंगने वाली जाति को महिमामण्डित कर सकते थे? कदापि नहीं। वस्तुतः यह महिमामंडन तभी हुआ था, जब रैगर उच्चकुलीन रघुवंशी क्षत्रिय थे, अन्यथा नहीं होता।
यदि बोकोलियाजी और गाड़ेगावलियाजी उर्ध्वगामी सोच रखते तो वे राजशेखर के उक्त ग्रंथ के मूल शब्द रगगुज्ज को रंगगुञ्ज(गुंज) के रुप में मुद्रित नहीं करवाते, बल्कि स्वयं को रघुवंशी रैगर क्षत्रिय कहते और सीना तान कर यह लिखते कि 9 वीं सदी ईस्वी में भी रैगर क्षत्रिय रगर अर्थात रैगर ही कहलाते थे और वे उच्चकुलीन थे । ब्राह्मण महाकवि राजशेखर ने उच्चकुलीन रैगर क्षत्रियों को ही महाराजा महेन्द्रपाल प्रथम(885-910 ईस्वी) के वंश के साथ महिमामंडित किया था।

रैगर भाइयो! अधोगामी सोच को बदल डालो औरउर्ध्वगामी सोच रखो ।
——–(अगली POST में उदाहारण संख्या —02)

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