रैगर भाइयो जागो! गंगामाता रैगर रघुवंशी क्षत्रियों कि कुल तारण देवी है। जबकि बनारस निवासी रैदास जी गंगा के भक्त थे। गंगा भक्त तो कोई भी हो सकता है, परंतु इन दोनों तथ्यों का गलत विवेचन कर रैगर का रैदास जी से संबंध गढ़ दिया गया है, जो गलत है क्योंकि रैगरों की मान्यता का रैदास जी की मान्यता से कोई संबंध नहीं है।

  जिसकी पुष्टि इस बात से होती है कि रैगर जाति प्रारम्भ से सौरोंजी में अपने मृतकों के अस्थि-पुष्प विसर्जित करती आई है, न कि बनारस में । वहाँ पर रैगरों के पंडित हरिद्वार के समान नहीं है, बल्कि गोत्रवार हैं और वे सामान्य वर्ग की जातियों के भी पंडित हैं । रैगरों की मान्यता है कि जब राजा भागीरथजी के प्रयत्न से गंगाजी इस पृथ्वी पर आई थी, तब जिस स्थान पर सूर्यवंशी महाराजा सगर के 60000 पुत्रों के अस्थि-पुष्प विसर्जित किए गए थे, वही स्थान सौरोंजी कहलाया। तभी से रैगर वहीं जाते थे। अब गंगा माता ने अपनी धारा बदली है, इसलिए रैगर हरिद्वार जाने लगे हैं। सौरोंजी के आगे राजा भागीरथजी के पीछे-पीछे गंगा माता बहती हुई वहाँ पहुंची, जहां सगर पुत्रों कि भस्मी पड़ी थी, उसे अपने पावन आगोश में लेकर समुद्र में प्रवाहित किया था, इसलिए सगर वंशज रैगर पूर्व दिशा में रहते हैं । कुछ अज्ञानी इसे घृणित कार्य से जोड़ते हैं, जबकि उनके लिए प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में दक्षिण दिशा निर्धारित थी ।

रैगर समुदाय के लोग गंगा माता के मंदिर बनाते थे, जो गांववार कच्चे होते थे, बाद में कई पक्के गंगा मंदिर बनाए गए । आगे चलकर रैगर जाति का एक तरफ तो सामाजिक पतन हो गया और दूसरी तरफ रामदेव जी महाराज में आस्था बढ़ गई । भारत आजादी के बाद रैगर लोगों में रामदेवरा जाने का आम चलन हो गया। वे अपने साथ रामदेवजी का घोडा और पगले लाते थे, जिनको गंगा माता के मंदिर में रखते थे । परंतु आगे चलकर रामदेवजी महाराज के मंदिर बने और उनमें गंगा माता की मूर्ति रखी जाने लगी। आज स्थिति यह हो गई कि हर रैगर बस्ती में कम से कम से रामदेवजी महाराज का एक मंदिर बन गया है।

रैगरों की रामदेव जी महाराज में नव विकसित इस मान्यता का कई लोग जाने-अनजाने में दुरुपयोग भी कर रहें हैं। कई तो यह भी कह रहे हैं कि रैगरों का रामदेवजी महाराज से उनके जीवनकाल से ही संबंध हैं। इसी प्रकार कुछ लोगों ने रैगरों की गंगा माता के प्रति मान्यताओं का गलत विवेचन कर रैगरों के साथ रैदासजी को जोड़ दिया गया है । भोले-भाले रैगर इसे सही समझ बैठे हैं । उनका अनुकरण कर गत कुछ वर्षों से सामान्यवर्ग के सामाजिक इतिहासकार भी यह लिख रहे हैं कि रैगर जाति के लोगों का ऐसा मानना है कि वे रैदासजी के वंशज हैं। परंतु उनके द्वारा कभी भी रैगरों की उक्त मान्यता की ऐतिहासिकता पर विचार नहीं किया है। जबकि इस कथन में उनकी यह मूक स्वीकृति है कि रैगरों की सोच सही नहीं है । सामान्यवर्ग के किसी भी सामाजिक इतिहासकार के किसी भी ग्रन्थ में आधिकारिक तौर पर यह नही लिखा गया है कि रैदासजी रैगर थे या रैगर जाति, रैदासजी की औलाद है। जबकि राजस्थान के कई मनचले या गलत फितरत के दलित (गैर रैगर) खुद की जाति के लिए यह कहते-फिरते हैं कि उनकी जाति से रैदासजी और रामदेवजी से कोई लेना-देना नहीं है और वे भोले-भाले रैगरों को बहकाते हैं कि रैदासजी रैगर थे तथा रामदेवजी, रैगरों के कुलदेवता है। इसी कारण से केवल रैगरों ने ही गांव-गांव में रामदेवजी के मंदिर बनाये हैं और रैदासजी को रैगर ही अपना गुरु मानते हैं। वस्तुतः ऐसे लोगों ने अपनी जाति को उच्च बताने की कुचेष्टा की है और ऐसे लोगों द्वारा ही रैगरों की सामाजिक प्रतिष्ठा को जगह-जगह चोट पहुंचाई जा रही है।

ऐसे दुष्प्रचारों का खुलकर विरोध करना चाहिए। क्योंकि ऐतिहासिक प्रमाण तो यह कहते हैं कि बाबा रामदेवजी और रैदास भक्त के जीवन काल में रैगर सामान्य वर्ग का ,एक क्षत्रिय समुदाय था। संभव है कि उस समय उनको क्षत्रिय रामदेवजी महाराज का निम्नवर्ग कि जाति से संबंध करने की बात सही नहीं लगी हो और अब जब खुद का सामाजिक पतन हुआ तो उनकी शरण में चले गए । भाइयो, रैगरों के साथ रैदासजी को जोड़ना तो हर कोण से ही गलत है।अपना दिमाग (IQ) लगाओ कि यदि रैगर लोग रैदासजी के वंशज हैं तो यह कैसे संभव हो गया कि गत 600 वर्षों में ही बनारस, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी रैदासजी की संतानों में से केवल राजस्थान के मूल निवासी रैगरों की जनसँख्या 11,00,000 (ग्यारह लाख) हो गई है? अतः केवल यही सही है कि रघुवंशी क्षत्रिय कुल रैगर जाति के सामाजिक पतन की जड़ केवल गत 150 वर्ष में रैगर जाति के सदस्यों के द्वारा की गई गलती में है, उसको छिपाना सही नही है, परंतु अब उसके प्रचार-प्रसार करने का कोई लाभ भी नहीं है, क्योंकि विगत के दुर्दिनों को कोई भी याद नहीं करता है। जैसेकि बैरवा, मेघवाल भाइयों ने एक मानसिकता विशेष विकसित कर ली है कि वे अब अपने परम्परागत जाति नाम से संबोधित होना पसंद नहीं करते हैं ।

भाइयो! सोचो और रैगर उत्थान की ओर कदम बढ़ाओ । कुछ लोगों द्वारा रैगर जाति को जाने-अनजाने में सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उनको रोकना चाहिए । आज का समय स्वतंत्रता और सामाजिक उत्थान का युग है। हर जाति और व्यक्ति को उसके पूर्वजों को महिमा मण्डित करने का अधिकार है। अमेरिका के राष्ट्रपति रीगन ने भी ब्रिटेन में उनके पूर्वजों की तलाश करवाई थी। परंतु किसी दीगर व्यक्ति के द्वारा किसी भी बहाने से किसी भी Social site या Website पर या किसी लेख में रैगर जाति और “रैगर” शब्द को गलत परिभाषित किया जाता है, रैगर जाति की उत्पत्ति को गलत रूप से पैदा किया जाता है, रैगर जाति की धार्मिक मान्यताओं का गलत निरूपण किया जाता है या रैगर जाति को चमार संवर्ग की जाति मानकर, उसके जनसंख्यात्मक आंकड़ों का गलत विश्लेषण किया जाता है तो ये सब गलत व असंवैधानिक कृत्य ही है ।

उदाहरणार्थ-

 

  1. एक गैर-रैगर ने एक Website पब्लिश की है, उसके जरिये उसने यह प्रचार करने का प्रयास किया है कि उसकी जाति CHAMAR CLUSTER की जाति नहीं है, जबकि रैगर जाति CHAMAR CLUSTER की जाति है।
  2. एक अन्य Website में बैरवा और मेघवाल जाति को चमार संवर्ग के बाहर रखते हुए उनको स्वंतत्र जातियां मानकर, उनका वर्णन किया है,जबकि उसूने अज्ञानता या पूर्वाग्रह से शासित होकर रैगर जाति का वर्णन चमार शीर्षक के अंतर्गत किया है। उसने रैगर जाति की स्वतंत्र पहचान पर विचार ही नहीं किया है।
  3. Jogendra Nath Bhattacharya (1896). Hindu castes and sects: an exposition of the origin of the Hindu caste system and the bearing of the sects towards each other and towards other religious systems / Jogendra Nath Bhattacharya में 108 वर्ष पूर्व यह लिखा गया था कि रैगर जाति ऐतिहासिक तौर पर नमक व्यवसाय से जुडी हुई जाति थी।
  4. ब्रिटिश भारत की सन् 1891 ईस्वी की जनगणना में रेहगर(रैगर) जाति को सामान्यवर्ग की श्रेणी में रखा था तथा उसे चूना और नमक व्यवसायी जातियों की समूह में गिना था। उसकी जनसंख्या लगभग 80000 थी । लेकिन एक दलित(गैर-रैगर) विद्वान ने उनकी कृति में यह लिख दिया है कि उक्त रेह्गर जाति शब्द शोरगर जाति के लिए प्रयुक्त हुआ है । परंतु जनसंख्या कि दृष्टि से रेहगर जाति शब्द रैगर जाति के लिए प्रयुक्त हुआ था और यही सही है।

 

One thought on “रैगरों में गंगा के बजाय रामदेव में बढ़ती आस्था व रैदास के प्रति गलत झुकाव”

  1. लेख बिल्कुल सही है मै सहमत हूँ इस लेख के लिए ।।very very nice

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