पृष्ठभूमि

रैगर भाइयों की सोच पर यह कहावत अक्षरशः लागू होती है कि –“घर का जोगी जोगना, आन गांव का सिद्ध” क्योंकि रैगर अपनी जाति के विद्वानों के बजाय, निम्नवर्ग की दूसरी जातियों के लोगों को सही व प्रकाण्ड विद्वान मानते हैं। चाहे वे साधारण व्यक्तित्व के व्यक्ति ही क्यों नहीं है?
कई रैगर विद्वानों ने प्रमाण दिया है कि रैगर जाति सूर्यवंशी/सगरवंशी/रघुवंशी क्षत्रियों की कुल की है। परंतु कई रैगर भाइयों को यह बात सही नहीं लगी है, श्री रूपचन्दजी जलूथरिया ने तो उस हर रैगर को लताड़ लगाई है, जिसने भी रैगरों को क्षत्रिय लिखा। इससे स्पष्ट है कि रैगर समुदाय अधोगामी सोच के मकड़-जाल में फंस चुका है, उनको निम्न सोच बहुत ही प्यारी व सही लगती हैं । उदाहरनार्थ,

1- मेघवालवंशी पंडित रामप्रकाशजी के कहने पर रामदेवजी को बलाई मान लेना-

          कई रैगरों को मेघवाल जाति में जन्में पण्डित रामप्रकाश की पुस्तिका “ब्रह्म-पुराण” की यह मनगढंत कहानी सही लगती है कि रामदेवजी मेघवाल जाति के थे। Is God an Untouchable? A Case of Caste Conflict in Rajasthan By Dominique-Sila Khan के अनुसार “उस मनगढ़ंत कहानी को लेकर तोमर राजपूत और मेघवाल लोग एक दूसरे के खिलाफ हो गये, उनकी सभाएं हुई और एक दूसरे के खिलाफ जुलूस निकाले गये। रैगरों ने मेघवालों का साथ दिया था।” इस तथ्य से स्पष्ट है कि रैगर लोगों की यह अधोगामी सोच ही है कि वे बिना विचारे खुद को बाबा रामदेवजी महाराज के समय से ही निम्न मान रहें हैं और उन्होंने बिना किसी गहन जांच-पड़ताल के ही रामदेवजी को भी बलाई मान लिया है। जबकि उस समय रैगर सामान्य वर्ग के क्षत्रिय थे। वस्तुतः Is God an Untouchable? में तत्समय के रैगरों का गलत वर्णन किया गया है। एक बात यह भी सामने आई है कि बिना सोचे समझे ही रैगरों द्वारा तोमर राजपूतों से पंगा लेने के कारण रामदेवरा रैगर धर्मशाला निर्माण प्रभावित हुआ। वस्तुतः पण्डित रामप्रकाश के कृत्यों का अधूरा ज्ञान रखने वाले रैगर भाइयों को यह मालूम ही नहीं है कि पण्डितजी तो रामदेवरा के तोमर राजपूतों का विरोध झेल ही नहीं पाये थे और तोमरों को गलत ठहराने के लिए उन्होंने झल्लाकर “ढोल में पोल” नामक दूसरी रचना लिख दी, जिसमें उन्होंने यह लिख दिया कि रामदेवजी के पीर होने की कहानी ही झूंठी है तथा जिसे रामदेवजी की समाधि मानकर पूजा जाता है, वह किसी मुसलमान की कब्र है, यह बात भी Is God an Untouchable? में वर्णित है। मेघवालों ने “ढोल में पोल” की बात पर कितना विश्वास किया है? उसका यहाँ पर विश्लेषण करना आवश्यक नहीं है। परंतु ऐसा लगता है कि मेघवाल समुदाय ने तो इस अध्याय को बहुत पहले ही उनके जीवन से फाड़कर फेंक दिया है।

वस्तुतः यह रैगर लोगों की अति निम्न अधोगामी सोच ही है कि उस झूंठे “ब्रह्म-पुराण” को अनेक रैगर भाइयों ने खरीद रखा है और उस झूंठे पुराण को एक धर्म ग्रन्थ मानते हैं तथा उसको पूजा के स्थान पर रखते हैं । विडम्बना तो यह है कि किसी भी रैगर भाई के मुंह से यह नहीं सुना गया है कि “ब्रह्म-पुराण” ग्रंथ की कहानी मनगढंत है, बल्कि इस ग्रंथ को सही मानने वाले रैगर भाई रामदेवजी को बलाई बताकर गर्व महसूस करते हैं । इससे ज्यादा और कोई निम्न सोच हो ही नहीं सकती है, क्योंकि रामदेवजी तोमरवंशी राजपूत थे ।

2- रैगरवंशी स्वामी जीवरामजी महाराज के लिए अशिष्ट भाषा का प्रयोग- 

          स्वर्गीय रूपचन्दजी जलुथरिया ने अपनी कृति रैगर जाति का इतिहास में पृष्ठ संख्या 13 पर स्वामी जीवामजी महाराज का नाम लिखे बिना उनको “अंधों में काना राजा” बताया है और उन्होंने खटीक, चमार, जाटव आदि निम्न जतियों में जन्में साधु-संतों को ज्ञानवान बताया है। दो रैगरों में वैचारिक भिन्नता का होना संभव है, लेकिन दूसरे के खिलाफ घटिया स्तर के शब्दों का प्रयोग करना सही नहीं लगता है। रैगर भाइयो! विचार करो, रैगर साधु-संतों, विद्वानों व समाज सुधारकों को गलत मानने की अधोगामी सोच भी इस जाति के विकास में बाधा पहुंचाती है। बाहरी व अधोगामी सोच के लोगों के बहकावे में आकर अपनी रैगर जाति और पूर्वजों की छवि को धूमिल मत करो। रैगर सपूत धर्मगुरु स्वामी ज्ञानस्वरूपजी महाराज, स्वामी केवलानन्दजी महाराज, स्वामी आत्मारामजी ‘लक्ष्य’, स्वामी श्री जीवारामजी महाराज, श्री सुखवीरसिंहजी आर्य(नौगिया), श्री सुखरामजी आदि विद्वान रैगर साधु-संतों व समाज सुधारकों के सुकार्यों के प्रति आदरपूर्ण विचार करो। ऐसा करने से आपकी रोजी-रोटी छिन नहीं जाएगी, बल्कि आगे ही बढ़ोगे। यह गर्व कि बात है कि रैगर सपूत आचार्य स्वामी केवलानन्दजी महाराज काशीपीठ के ब्रह्मनिष्ठ महामंडलेश्वर के पद पर पदासीन हुए थे ।

——–(अगली POST में उदहारण संख्या —03)

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