जातिनाम के मनमाने हिज्जों से उसकी व्युत्पत्ति गढ़ना:-

                वर्तमान सामाजिक इतिहासकारों ने कुछ जातियों के लोगों द्वारा जो भी पेशा(व्यवसाय) किया जा रहा, उन पेशानामों को आधार बनाया जाकर, उनके जातिनामों की व्युत्पत्ति लिख दी गयी है। उदाहरणार्थ-

1-रंगड़-

          आधुनिक युग के सामाजिक इतिहासकारों ने पाया कि रंगड़ लोग बहादुर यौद्धा हैं । इस आधार पर उन्होंने परिकल्पना की कि रंगड़ों के पूर्वज रणकर थे और ‘रंगड़’ उसी ‘रणकर’ शब्द का, अपभ्रंश होना चाहिये। परंतु यह एक कोरी कल्पना मात्र है। क्योंकि ‘रंगड़’ शब्द ‘रघु’ का रूपान्तरण है। इस शब्द को कई लोगों ने प्रयुक्त किया है। मुस्लिम युग में रंगड़ राजपूत, अर्वाचीन राजपूत, जाट, गूजर, यादव, अहीर, जटसिख आदि जो भी सैन्य जाति के लोग मुसलमान बन गए थे, उन सभी के वंशज अपने आपको रंगड़ राजपूत मुसलमान ही कहते हैं।

2-रैगर-

          कुछ आधुनिक युग के सामाजिक इतिहासकारों ने देखा कि कई रैगर रंगत करवाते या करते हैं और उन इतिहासकारों के द्वारा वास्तविकता की छानबीन किये बिना ही, जातिगत पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर, यह परिभाषित कर दिया गया कि ‘रैगर’ शब्द रंगगर(रंगने वाला) का अपभ्रंश है। परंतु यह भी एक कोरी कल्पना है, क्योंकि यदि ऐसा हुआ है तो ‘रंगगर’ शब्द का प्राचीन अस्तित्व होना चाहिए और उसके अपभ्रंशीकरण में लंबा समय लगा होगा, परंतु उन इतिहासकारों के द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उनको किस प्राचीन शब्दकोश में ‘रंगगर’ शब्द मिल गया है और किस प्राचीन ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख है कि कौन लोग कब पतित होकर, ‘रंगगर’ कहलाये थे और कब तक ‘रंगगर’ शब्द ‘रैगर’ ध्वनि में किस व्याकरण नियम से बदल गया था? उनके द्वारा इस सच्चाई पर बिलकुल ही गौर नहीं किया गया कि भारत की स्वतंत्रता के पूर्व अनेक समुदाय हजारों वर्षों से रंगत अर्थात चमड़ा रंगने का काम किया करते थे, उनको परंपरागत रूप से ‘चमार’ ही कहा जाता रहा है, न कि रैगर कहा गया था। चूंकि ‘रग’ अर्थात ‘रैगर’ शब्द का अस्तित्व ईसा पूर्व का है और वह ‘रघु’ शब्द का रूपान्तरण है । यदि रैगर समुदाय द्वारा मूल रूप से रंगत की गई होती तो रैगर शब्द 2000 वर्ष तक जीवित ही नहीं रहता, बल्कि बहुत पहले ही जन साधारण द्वारा इस समुदाय को भी ‘चमार’ जातिनाम से संबोधित करने लग गए होते, जबकि ऐसा नहीं हुआ। अर्थात रैगरों का समुदायगत और कोई कर्म था और वह कृषि कार्य व सेना में नौकरी करना था, जिसके कई प्रमाण हैं। इसलिए उन इतिहासकारों या मनचलों के विरुद्ध यह प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है कि उन लोगों द्वारा, अब किस प्रयोजन से रैगर को कुपरिभाषित किया जा रहा है? देखा जाए तो उनकी मानसिकता ही पक्षपात पूर्ण लगती है, क्योंकि-

जातिनाम के मनमाने हिज्जों से उसकी व्युत्पत्ति गढ़ना:-

वस्तुत रंगड़ एवं रैगर शब्द रघु शब्द के रूपान्तरण हैं। यह शब्द रूपांतरण प्रक्रिया इस प्रकार संभव हुई है :-
रघु → रघ → रग → रगर → रंगर → रंगड़
रघु → रघ → रग → रगर → रहगर → रेहगर → रैगर

‘रग’ वंशनाम के अस्तित्व का प्रमाण

‘रग’ एक प्राचीन राजवंश है। कर्नल टाड ने भी रग क्षत्रियों को रघुवंश की एक शाखा बताया है। इस वंश के लोग चहुं ओर फ़ेल गए थे

1- ईरान की रग जनजाति-

        ईसा पूर्व रग क्षत्रियों की रग नामक राजधानी फारस में स्थित थी। उस रग नगर से सिकंदर महान भी गुजरा था। उस समय भी वहां पर रग लोग आबाद थे। रग नगर मेडिया साम्राज्य(7 वीं सदी ईसा पूर्व) का सबसे बड़ा नगर था। प्रथम सदी ईसा पूर्व तक उत्तरी ईरान रगियाना(रगों का देश) कहलाता था। प्रबलता है कि वहां से रग क्षत्रिय अन्यत्र भी चले गए थे। ऐसा माना जाता है कि महात्मा जोरास्टर रग नगर के निवासी थे। अर्थात रग क्षत्रिय 4000 वर्ष पहले भी थे। वर्तमान में वह राग नगर ईरान के तेहरान का उपनगर रैय नामक उपनगर कहलाता है।

2- महाभारतकाल के रग रघुवंशी क्षत्रिय

         भीष्मपर्व महाभारत(हिन्दी अनुवाद, गीताप्रेस, गोरखपुर) के श्लोक(6, 9, 54) में रग नामक क्षत्रियवंश का उल्लेख आया है, परंतु कुछ इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि इस श्लोक में उरग जनजाति का वर्णन किया गया है। जबकि महाभारत काव्य के दो श्लोकों को छोड़कर, अन्य अधिकांश श्लोकों में “उरग” शब्द इच्छाधारी नाग जाति के लिए अर्द्ध मनुष्य जनजातियों के साथ प्रयुक्त हुआ है। कुछ श्लोकों में यह शब्द वनचर सर्प के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। अन्य ग्रन्थों में भी इसी अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं । वस्तुतः आर्यावर्त में उरग नामक कोई जनजाति ही नहीं थी, बल्कि इसका आभासी आगमन हुआ है, जिसकी जड़ सभापर्व महाभारत के श्लोक(2, 27, 19) में दिखती है। वस्तुतः किसी स्तर पर इस श्लोक में “उरसावासिन” शब्द के स्थान पर “उरगावासिन” का आगमन हो गया था और उससे “उरगा” जनजाति की अवधारणा उत्पन्न कर दी गई है, परंतु जिस क्षेत्र को उरगा देश परिकल्पित कर रहे हैं, द्रोणपर्व महाभारत के श्लोक(7, 11,16) के अनुसार वह उरसा क्षत्रियों का देश था। इस तथ्य के सामने आने के बाद अब कई पश्चिमी विद्वान कहते हैं कि उरसा और उरगा एक ही हैं । जो सही नहीं है, क्योंकि उरसा सूर्यकुल का राजवंश था, इसके विपरीत उरगा को नागकुल का होना परिकल्पित किया गया है। अर्थात दो अलग-अलग कुलनामों को एक समझना सही नहीं है। कुछ विद्वानों ने बिना किसी गहन छानबीन के ही उक्तानुसार उरगा जनजाति का अस्तित्व मानकर, भीष्मपर्व महाभारत के श्लोक(6, 9, 54) के “वातजामरथोरगाः” शब्द का संधिविच्छेद विसर्गसंधि के नियम से (वात+जाम+ रथः+ रगाः) न करके, स्वर संधि नियम से करके, यह परिकल्पित कर लिया गया है कि इस शब्द में उरगा(वातज +अमरथ + उरगाः) वंश का नाम आया है। जबकि इस शब्द का संधि विच्छेद वात+जाम+ रथः+ रगाः ही ग्राह्य है। इन चारों वंशनामों से जाट गोत्र हैं। अर्थात महाभारतकाल में  रघुकुल का रग राजवंश का अस्तित्व था, न कि उरगा का।

3- अफ़ग़ानिस्तान का रग राजवंश-

          रग(रगर) क्षत्रियों के अस्तित्व की पुष्टि इस बात से भी होती है कि वर्तमान उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के बदख्शां प्रान्त में रग नामक एक शहर है। उसका नामकरण निश्चित रूप से प्राचीन रग जनजाति के नाम पर ही हुआ है। वहां के निवासी फ़ारसी बोलते हैं। अंग्रेज काल में रग शहर रग नामक जिले का मुख्यालय था। लेकिन वर्तमान में उसके तीनों ही उपखण्डों को तीन जिले बना दिए गए हैं। अब प्राचीन रग शहर रगिस्तान(रग लोगों का आवास) नामक नये जिले का मुख्यालय है। यह उल्लेखनीय है कि उस भू भाग में प्रचलित सैकड़ों मुस्लिम खांप शब्द स्पष्टतया रैगर गोत्रवंश नामों के संकुचित रूपांतरण प्रमाणित होते हैं। अतः ऐसा लगता है कि महाभारतयुद्ध में रग क्षत्रिय कौरवों कि तरफ थे, जब वे हार गए तो वे सुरक्षार्थ सुदूर उत्तर की ओर चले गए और रग नामक नयी राजधानी कायम की, जो वर्तमान रग नगर लगता है। यह भी संभाव है कि ईरान की ओर जो रग क्षत्रिय चले गए थे, उनके वंशजों का कोई समूह वापस अफ़ग़ानिस्तान में आ गया और , उसने वहाँ रग नामक नई राजधानी स्थापित की थी। यह भी स्पष्ट होता है कि महाभारत काव्य में वर्णित उरग/रग नगर की भौगोलिक स्थिति इस वर्तमान रग नगर के बहुत नीचे दक्षिण में प्रमाणित होती है। तात्कालिक परस्थितियाँ कैसी भी थी? सभी रग नगरों को रग अर्थात रैगर रघुवंशी क्षत्रियों ने ही आबाद किए थे । सूडान की रग नदी के किनारे भी रग नामक नगर स्थित है, जो मौसम विज्ञान कि दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है।

रैगर जातिनाम के विरुद्ध फैलाई गई भ्रांतियाँ

1- रैगर इतिहासकारों की गलत परिकल्पना –

         कुछ रैगर इतिहासकारों ने परिकल्पित किया है कि रैगर शब्द 14वीं सदी ईस्वी के रंगड़ राजपूत शब्द का अपभ्रंश है। लेकिन यह भी सही नहीं है। क्योंकि 09 वीं सदी ईस्वी के ब्राह्मण कवि राजशेखर ने “बालरामायण” तथा “रघुकुलचिन्तामणि” नामक कृतियों क्रमशः रंगड़ और रगर(रैगर) रघुवंशियों का उल्लेख किया है। कवि राजशेखर गुर्जर नरेश महाराजा महेन्द्रपाल प्रथम(885 -910 ईस्वी) के गुरु व राजकवि थे। जिससे स्पष्ट है कि रैगर 14वीं सदी ईस्वी से भी पहले का एक प्राचीन समुदाय है। परमारवंशीय महाराजा विक्रमादित्य (प्रथम सदी ईसा पूर्व) के काल में भी उज्जैन में रेहगर(रैगर) वंश के सूर्यवंशी क्षत्रिय रहते थे। कुछ विद्वान कहते हैं कि पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र की कृति “जाति भास्कर” में लिखा है कि 14 वीं सदी ईस्वी में जो सागरवंशी रंगड़ राजपूत मुस्लिम बनने से मना कर दिया था, वे रैगर कहलाये हैं। उनके अनुसार अगरोहा नगर के अग्रवाल सागरवंशी क्षत्रिय भटिंडा(पंजाब) में आकार रंगड़ राजपूत कहलाए थे । अर्थात रंगड़ों और रैगरों की उत्पत्ति का एक ही मूल है। परंतु यह बात सम्पूर्ण या सभी रैगरों के लिए सही नहीं हैं, क्योंकि रैगर ईसा पूर्व के हैं, अतः 14 वीं सदी ईस्वी के रंगड़ों से बने रैगर समुग को केवल भटिंडा रै गर शाखा कहा जा सकता है।

2- कालेलकर आयोग द्वारा रैगर जाति का गलत संवर्गीकरण

        स. 1937 ईस्वी की SC सूची में तो रैगर जाति नाम को शामिल ही नहीं किया गया था। भारत की आजादी के बाद रैगर सपूत डॉ. खूबराम जजोरिया के प्रयास से स. 1950/51 ईस्वी की SC सूची में दिल्ली और राजस्थान के लिये रैगर जाति नाम को स्वतंत्र रूप से दर्ज किया गया था। परंतु काका कालेलकर अनुसूचित जाति आयोग, 1956 ने रैगर जाति के स्वतंत्र अस्तित्व को समाप्त कर दिया और उसके आधार पर जनगणना विभाग के द्वारा भी रैगर जनसंख्या आंकड़े की स्वतन्त्र पहचान को समाप्त कर दिया गया है। कालेलकर आयोग के बाद ‘रैगर’ जाति शब्द को परिभाषित करने में हर एक ने अपनी-अपनी मनमर्जी की है। इनमें रैगर समुदाय में जन्में कई लोग भी शामिल है। जबकि इसके विपरीत बैरवा और मेघवाल समुदाय में जन्में किसी भी इतिहासकार ने अपनी जाति शब्द को कुपरिभाषित नहीं किया है। मेघवाल समुदाय में जन्में श्री आर. पी. सिंह आई. पी. एस. (सेवानिवृत) ने तो उनकी “मेघवंश एक सिंहावलोकन” नामक कृति में यहां तक लिख दिया गया है की ‘चमार’ शब्द का शब्दार्थ “चर्मकार” नहीं है, अपितु च + मार = और + मारो = और मारो है। कालेलकर आयोग राजस्थान में बैरवा, बलाई, मेघवाल जातिनामों को चमार-संवर्ग से मुक्त करा गया है । परंतु उसने रैगर जातिनाम के साथ न्ताय नहीं किया ।

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