हरियाणा राज्य का सिरसा भूभाग जाट बाहुल्य क्षेत्र है। लेकिन जाटजाति में सिरसा, सेरसिया जैसे शब्दों से गोत्रनाम नहीं है। जबकि रैगर रघुवंशी समुदाय में सेरसिया नामक एक गोत्रवंश शब्द विध्यमान है, जो सिरसा शब्द का इया-प्रत्ययीकृत शब्द दिखता है (सिरसा + इया-प्रत्यय → सैरस् + इया = सैरसिया), परंतु  यह उत्पत्ति सही नहीं लगती है, क्योंकि सैरसिया रैगर गोत्रनाम की उत्पत्ति सिरसा नगर नामकरण से हजारों वर्ष पूर्व हो गयी थी।
आजकल सेरसिया गोत्र के रैगर अपने को शेरावत और शेर भी लिखते हैं, जो रैगर गोत्रनाम-प्रारूप के शब्द नहीं लगते है। जाट जाति का शेरावत भी मूल गोत्रशब्द नहीं है, क्योंकि वे भी सहरावत गोत्र को सेरावत(शेरावत) लिखते हैं।

सिरसा नगर की प्राचीनता व शैरीषक क्षत्रियवंश-
हरियाणा में सिरसा नामक एक क़स्बा है, जो उत्तरी आर्यावर्त का एक प्राचीन नगर है। इसका पुराना नाम सैरीशक है, जिसका उल्लेख महाभारत, पाणिनी की अष्टाध्यायी, दिव्यावदान आदि ग्रंथों में भी किया गया है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में इस बात का भी उल्लेख है कि छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सैरीशक एक समृद्धशाली नगर था।
सिरसा नगर नाम की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि सैरीशक शब्द पहले सिरस्त में तथा बाद में सिरसा शब्द में उच्चारित/परिवर्तित हुआ है। परंतु सिरसा नगर के स्थानीय लोगों की यह मान्यता है कि 07 वीं सदी ईस्वी में सरस नामक राजा ने एक किले का निर्माण करवाया था, उसी के नाम से इस नगर का नामकरण सिरसा हुआ है। एक मान्यता यह भी है कि सरस्वती नदी के नाम से सिरसा नगर का नामकरण हुआ है। जबकि सही यह लगता है कि इस नगर का नामकरण प्राचीन शैरीषक वंशनाम पर हुआ है। सभापर्व महाभारत(हिंदी अनुवाद, गीताप्रेस, गोरखपुर) पृष्ठ संख्या 765 पर अध्याय 32 के श्लोक 06 में शैरीषक नगर का उल्लेख इस प्रकार से मिलता है:-
शैरीषकम् महोत्थम् च वशे चक्रे महाद्युतिः।
आक्रोशम् चैव राजर्षि तेन युध्दमभून्मत्।। महाभारत 02, 32, 06 ।।
अर्थात् नकुल ने प्रचुर धन-धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशों पर अधिकार कर लिया। महोत्थ देश के अधिपति राजर्षि आक्रोश को भी जीत लिया। आक्रोश के साथ नकुल का बड़ा भारी(भयंकर) युद्ध हुआ था।
पाण्डुपुत्र नकुल ने शैरीषक नगर विजय से पहले उसके दक्षिण में स्थित मरु व माध्यमिका(मध्य राजपूताना) प्रदेशों को विजित किया था, जो आज राजस्थान के मारवाड़ व चित्तौड़- मेरवाड़ा भूभाग कहलाते हैं। इस प्रकार शैरीषक एक प्राचीन शब्द है, जो शिरीष शब्द का अक-प्रत्ययीकृत वंशशब्द लगता है, जिसकी शब्द-संरचना इस प्रकार से हुई है:-
(1)- शिरीष(आदिपुरुष) + अक-प्रत्यय → शैरीष् + अक = शैरीषक(शिरीष वंशज)।
अर्थात् शिरीष नामक क्षत्रिय राजा के नाम से उसके वंशज शैरीषक वंशी कहलाये थे तथा उस वंशनाम पर ही उसकी राजधानी का नामकरण शैरीषक(आज का सिरसा) हुआ था।
व्यक्तिसूचक शब्द शिरीष के अस्तित्व की पुष्टि मत्स्यपुराण से भी होती है। इसके अनुसार अत्रीकुल के ब्राह्मणों के एक ऋषिगोत्र का नाम शिरीष है, जो शिरीष नामक ऋषि के नाम से चला है। लेकिन शिरीष शब्द क्षत्रियनाम सूचकशब्द लगता है, जिससे यह प्रकट होता है कि शिरीष कोई क्षत्रिय राजा था, जो वानप्रस्थाश्रम के समय ऋषि पद पाकर अत्रीवंश से दीक्षित हुआ था, जिसके ब्राह्मण अनुयायी शिरीष ऋषिगोत्र के कहलाये थे। इसकी पुष्टि इस ऐतिहासिक तथ्य से भी होती है कि चन्द्रवंशी क्षत्रियकुल में जन्में विश्वामित्र के पुत्रों के नामों से ब्राह्मणकुल नाम चले हैं। उनमें एक पुत्र का नाम शिरीषी(महाभारत 13, 04, 48/59) भी था।

सेरसिया रैगर गोत्रवंश-
महाभारत काव्य से प्रमाणित है कि महाभारतयुद्ध के समय शैरीषक क्षत्रियों का राज्य क्षेत्र आज का सिरसा भूभाग था। लेकिन ऐसा लगता है कि उसके बाद महाराजा अग्रसेनजी की प्रेरणा से गठित रग रघुवंशी क्षत्रिय संघ समुदाय में महापुरुष शिरीष क्षत्रिय के वंशज शामिल होकर, शैरसिया वंश के रग क्षत्रिय कहलाये थे, जिसके वंशज आज के सेरसिया गोत्रवंश के रैगर हैं। अर्थात्-
(1)- शिरीष(आदिपुरुष) + या- वंशवाचक प्रत्यय → शैरीष् + या = शैरीष्या(शिरीष वंशज) → शैरीसिया → शैरसिया → सेरसिया (रैगर गोत्रवंश)।

टिप्पणी:-
(1)- महाभारतयुद्ध के समय शैरीषक राज्य के पास आज का भादरा भद्रवंशियों का, अग्रोहा नगर अग्रवंशियों का तथा रोहतक रोहतासवंशियों का राज्य क्षेत्र थे (महाभारत 03, 254, 20)। भद्रवंशी क्षत्रिय रग संघ में शामिल होकर भद्रवावंश के रग कहलाये थे, जिनके वंशज आज के बंदरवाल गोत्र के रैगर है(भद्रवा → भद्रवाल → बदरवाल → बंदरवाल)। इस बात की भी प्रबलता है कि रोहतासवंश के क्षत्रिय रौहियावंश रग कहलाते थे। अग्र व रोहतास वंश के क्षत्रिय सूर्यकुल के थे। ऐसा लगता है कि शैरीषक व भद्र भी सूर्यकुल के क्षत्रिय थे।
(2)- जाटजाति में रसिया शब्द से एक गोत्रनाम है। जाट इतिहासकार महेन्द्रसिंह आर्य ने अपनी कृति आधुनिक जाट इतिहास के पृष्ठ संख्या 278 पर लिखा है कि संगीतप्रेमी जाट लोग रसिया गोत्र के कहलाते हैं। लेकिन यह परिकल्पना करना सही नहीं लगता है कि सेरसिया रैगर गोत्रवंश इस रसिया जाट गोत्र का उपवंश हैं। क्योंकि सेरसिया रैगर गोत्रवंश 5000 वर्ष प्राचीन व महाराजा अग्रसेनकालीन है।

संदर्भ-
1. महाभारत(हिंदी अनुवाद), गीताप्रेस संस्करण – वेद व्यास
2. पाणिनी की अष्टाध्यायी
3. बौद्ध ग्रन्थ दिव्यावदान
4. मत्स्यपुराण – वेद व्यास
5. आधुनिक जाट इतिहास – महेन्द्रसिंह आर्य
6. विभिन्न वेबसाईटस्

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