रैगरों में गंगा के बजाय रामदेव में बढ़ती आस्था व रैदास के प्रति गलत झुकाव

  जिसकी पुष्टि इस बात से होती है कि रैगर जाति प्रारम्भ से सौरोंजी में अपने मृतकों के अस्थि-पुष्प विसर्जित करती आई है, न कि बनारस में । वहाँ पर रैगरों के पंडित हरिद्वार के समान नहीं है, बल्कि गोत्रवार इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए यहाँ टच/क्लिक करे…….