Table of Contents

 

पृष्ठभूमि ::रैगर गोत्र प्राचीन क्षत्रिय वंश व उनके रूपान्तरण हैं –

          जिन्हें रैगर समुदाय के गोत्र माना जा रहा है, वे वास्तव  में प्रभावशाली क्षत्रिय महापुरुषों के नामों के इया-प्रत्ययीकृत शब्दों से चले वंशनाम और कालांतर में उनके उपसर्ग(उन वंशों में जन्में प्रभावशाली क्षत्रिय महापुरुषों के नाम या नामांश) लगकर चले उपवंश नाम हैं। जैसे, महापुरुष ‘मुर’ के वंशज ‘मौरिया’ वंश के रैगर कहलाये हैं।

          इसी प्रकार कौटिया, कौलिया (खौलिया), गौलिया, दौलिया, मौलिया, गौरिया, दौरिया, टौलिया, जैनिया आदि भी वंश श्रेणी के रैगर गोत्र है, जबकि मदनकोटिया, बोकोलिया, पींगोलिया, चांदोलिया, मेमोलिया, बागोरिया, मांदोरिया, जाटोलिया, उज्जैनिया आदि उपवंश श्रेणी के रैगर गोत्र है, जो क्रमशः उक्त कौटिया, कौलिया(खौलिया), गौलिया आदि वंशों के उपवंश हैं। इस प्रारूप के लगभग 75% गोत्र हैं और शेष गोत्रवंश क्षत्रिय महापुरुषों के नामों के अ/ई-प्रत्ययीकृत शब्दों के वाल-प्रत्ययीकृत शब्दों से चले हैं। जैसे, महापुरुष ‘मुर’ के वंशजों की एक शाखा ‘मौर’ कहलाती हैं, जिनका एक उपसमूह ‘मोरवाल’ रैगर कहलाते हैं।
          20 वीं सदी ईस्वी के 20 के दशक में भरतपुर क्षेत्र के अधिकांश रैगर परिवारों ने अपना जातिनाम जाटव कर लिया था, इसलिये कई प्राचीन रैगर गोत्र वर्तमान रैगर समुदाय में चिन्हित नहीं होते हैं।

रैगर वंश का अस्तित्व –

          कुछ समाजशास्त्री कहते हैं कि जाट जाति एक आनुवांशिक समूह(EthnicGroup) और रैगर जाति एक सामाजिक समूह(SocialGroup) है, जबकि रैगर जाति भी एक आनुवांशिक समूह(EthnicGroup) ही है, क्योंकि रैगर सामुदाय के लोग किसी प्रभावशाली रघुवंशी क्षत्रिय महापुरुष के बहुपुत्रों के वंशज प्रमाणित होते हैं, जिसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि रैगर एक क्षत्रिय वंशनाम है, जो ‘रग’ शब्द का परिवर्द्धित रूपान्तरण(रग →रगर →रैगर) है। ईसा पूर्व रग रघुवंशी क्षत्रियों का प्रभुत्व उत्तर-पश्चिमी आर्यावर्त से लेकर मेसोपोटेमिया तक विस्तृत था। उनका रग नामक नगर वर्तमान तेहरान के लगते स्थित था। कुछ विद्वान कहते हैं कि महात्मा जुरास्टर रग नगर के निवासी थे और रग नगर ही तेहरान का राए(Rae) नामक उपनगर कहलाता है।
          ‘रग’ राजवंश नाम स्वयं भी ‘रघु’ का ध्वनि रूपान्तरण(रघु→रघ →रग) है। महाराजा रघु प्राचीन अयोध्या के सूर्यवंशी महाराजा सगर के वंशज थे।

रैगर व जाट गोत्रवंशों में शाब्दिक सबंध-

          रैगर समुदाय जाट या अन्य जाति की उपजाति नहीं है, परंतु एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि रैगर गोत्र या तो एक जाट गोत्रनाम है अथवा रैगर गोत्रनाम का जनकशब्द कोई जाट गोत्र है, इसलिए रैगर गोत्रवंशों की उत्पत्ति का लगभग वो ही इतिहास होना चाहिए, जो उनके संगत जाट गोत्रशब्दों का है।

रैगर गोत्रवंश नामों के चलन की कुछ असंगत मान्यताओं  का संक्षिप्त परिचय

रैगर गोत्र प्राचीन क्षतियवंश हैं, जिनका उल्लेख हेरोड़ोटस(स. 484-425 ईसा पूर्व) ने भी किया हैं, परन्तु बिना किसी गहन छन-बीन के ही रैगर गोत्रनामों की मनमानी उत्पत्ति लिख दी गई है। उनमें से कुछ असंगत मान्यताएँ इस प्रकार है-

प्रथम- करटड़ी आदि 22 गांवनामों के प्रथम अक्षरों से गोतनामों का चलन –

         महाराजा अग्रसेनजी के पुत्रों के नामों और अग्रवाल ऋषिगोत्र नामों की शाब्दिक तुलना करने से यह बात सामने आती है कि महाराजा अग्रसेनजी ने उनके गुरावदेव आदि 18 पुत्रों के नामों के प्रथम अक्षरों से प्रारम्भ होने वाले गर्ग आदि 18 ऋषियों के नामों से अग्रवाल समुदाय के लिए गर्ग आदि 18 ऋषिगोत्रों की स्थापना कारवाई थी। शायद इसी बात से प्रेरित होकर स्वामी जीवारामजी महाराज ने अपने ग्रंथ “श्री रैगर जाति वर्णप्रकाश गोत्रशिक्षा, संवत 1998 विक्रमी; पृष्ठ संख्या 18” में वर्णित किया है कि रैगर गोत्रनामों का चलन 14 वीं सदी में भटिण्डा(पंजाब) के आस-पास आबाद करटड़ी, खींवर, ज्ञानमण्ड, चंदुमण्ड, जगमोहनपुरा, टोमाटी, डमानुं, ताला, दामनगढ़, धोलागढ़, नैनपाल, पीपलासर, फरदीमा, बरबीना, भूदानी, मैंनपाल, रतनासर, लुबान, सिंहगौड़, हरणोद, आमा, उदयसर कुल 22 गांवों के नामों के प्रथम अक्षरों से प्रारम्भ होने वाले शब्दों पर हुआ। आश्चर्य है कि उक्त 22 गांवों के नामों के सभी प्रथम अक्षर भिन्न-भिन्न हैं और स. 1940 ईस्वी में पाये गये रैगर गोत्रनामों के प्रथम अक्षर भी उक्त 22 अक्षर ही हैं, परंतु स्वामीजी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उक्तानुसार चलित माने गये रैगर गोत्रनामों के लिये ये शब्द कहां से आये थे? वस्तुतः स्वामीजी की यह मान्यता सही नहीं हैं, क्योंकि रैगर गोत्रनामों का चलन तो महाराजा अग्रसेनजी के काल में ही हो गया था।
         यूनानी इतिहासकर हेरोडोटस(स. 484 – 425 ईसा पूर्व) ने भी कई रैगर गोत्रनामों का उल्लेख यूनानी शैली में किया है, जैसे पश्चिमी ग्रन्थों में दौरिया, ऐलिया, गौरिया मौरिया, डबरिया, बाईवाल, हिंगोनिया आदि रैगर गोत्रनामों को क्रमशः दोरोई, ऐओलोई, डबरोई, गोरोई, मोरोई, बोईओई, हीगेनोई आदि लिखा है। उदाहरणार्थ –

Dauriya(A clan of Rag Raghuvanshi Kshatriyas of Aryavrat)  =  Daur + iya(Sanskrit suffix)  → Daur + oi (Greek suffix) =  Dauroi → Doroi (Greek Transformation).

          यह भी प्रमाणित होता है कि रैगर जाति के पूर्वजों का संबंध अगरोहा नगर से भी रहा है और उक्त 22 गांवों को रैगर क्षत्रियों के सहवंशजों ने 12-13वीं सदी ईस्वी में बसाया था। पण्डित ज्वालाप्रसादजी मिश्रा ने “जाति भास्कर” में वर्णित किया है कि मुहम्मद गौरी(स. 1149- 1206 ईस्वी) ने अगरोहा नगर पर कई बार आक्रमण किये थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि उन आक्रमणों से परेशान होकर वहां के कई लोगों ने अगरोहा नगर का त्याग कर दिया था। उसी समय रैगर क्षत्रियों के सहवंशजों ने भी अगरोहा नगर का त्याग कर दिया था और वे वर्तमान भटिण्डा(पंजाब) के आस-पास आ गये और 22 स्थानों पर अपने पड़ाव डाल दिये, जिसके परिणाम स्वरूप 22 गांव आबाद हुए। उन गांवों के नामकरण ऐसे 22 शब्दों पर हुए थे कि उन सभी के प्रथम अक्षर भिन्न-भिन्न थे। ऐसा लगता है कि उन्होंने एक विशेष योजना के अंतर्गत अपने को 22 समूहों में बांट लिया था और एक समूह में शामिल होने वाले सदस्यों के वंशनामों के प्रथम अक्षर समान थे और प्रत्येक समूह का एक प्रमुख वंश था, जिस पर उनकी आबादी का नामकरण हुआ और उसी के परिणाम स्वरूप उक्त 22 गांवों के नामकरण 22 भिन्न-भिन्न अक्षरों पर चलित होना संभव हुआ है।

द्वितीय- भरतपुर-धौलपुर-करौली क्षेत्र(दक्षिण पूर्वी राजस्थान) व टोंक क्षेत्र के गांवनामों से गोत्रनामों  का चलन-

          श्री रूपचंद जलुथरिया M.A.(History) ने 20 वीं सदी ईस्वी के 50 के दशक से ही स्वामी जीवारामजी महाराज के आचार-विचार का विरोध करना शुरू कर दिया था और लगभग 50 वर्ष बाद जलुथरियाजी ने यह कहा कि रैगर जाति कि उत्पत्ति 1000 वर्ष पूर्व जाटव जाति से हुई है और अधिकांश रैगर गोत्रनामों का चलन भरतपुर क्षेत्र(दक्षिण पूर्वी राजस्थान) और टोंक क्षेत्र के गांवों के नामों को निरुपित करने वाले शब्दों पर हुआ है और उन्होने अपने ग्रंथ “रैगर जाति का इतिहास; पृष्ठ संख्या 32-43” पर लगभग 270 गोत्रनामों की सूची दी है, जिनको रैगर गोत्र बताया है, परंतु उनमें कई ऐसे लगभग 50 त्रनाम भी गढ़ या कल्पित कर लिये गये हैं, जो रैगर गोत्र लगते ही नहीं हैं, जिन्हें वास्तविक रैगर गोत्रनामों की सूची के नीचे तारांकित(*) किया गया है।
          कई रैगर गोत्रनामों को संशोधित कर रखा है, जलूथरियाजी ने इस बात पर विचार किये बिना ही, उन नामों को प्राचीन और वास्तविक रैगर गोत्र मानकर, उन्हें भरतपुर और टोंक क्षेत्र के मिलते-जुलते गांवनाम से चलित बता दिया है, जिनकी सूची को वास्तविक रैगर गोत्रनामों की सूची के नीचे तारांकित(**) किया गया है।
जलुथरिया जी ने इन बातों को भी स्पष्ट नहीं किया है कि-
1-उक्त भूभाग के लगभग 6000 गांवों में से केवल 220 गांवों के नामों से ही विशिष्ट प्रारूप के रैगर गोत्रनाम क्यों चल पाये हैं और अन्य गांवों के नामों से रैगर गोत्र क्यों नहीं चले है?
2- किसी-किसी रैगर गोत्रनाम के संगत एक से अधिक गांवनाम है, उनमें से केवल एक ही गांव से चले जाटव ही उस गोत्र के रैगर क्यों कहलाये हैं और अन्य गांव से चले जाटव उस गोत्र के रैगर क्यों नहीं कहलाये?
3- जब “जाटव जाति” नामकरण  20 वीं सदी ईस्वी के 20 के दशक हुआ है तो जलुथरिया जी जैसे विद्वान और इतिहासविज्ञ ने इस जातिनाम का अस्तित्व 1000 वर्ष पहले कैसे कल्पित कर लिया है?
          वस्तुतः जलुथरियाजी ने उक्त प्रश्नों पर विचार किये बिना ही, कल्पना से रैगर जाति और उसके गोत्रनामों की उत्पत्ति स्थापित कर दी है, जो गलत है, क्योंकि रैगर गोत्रनामों का चलन महाराजा अग्रसेनजी के काल में ही हो गया था और उस समय रैगर जाति के पूर्वज रग रघुवंशी क्षत्रिय कहलाते थे।

तृतीय – श्री गंगा माता व ब्रहमाजी द्वारा सतयुग में क्रमशः रैगर जाति व  रैगर गोत्र नामकरण किया जाना-

          श्री रमेशचंद्र जलुथरिया ने एक हास्यास्पद कल्पना की है कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने पाषाण मूर्तियां बने महाराजा सगर के 60000 पुत्रों में से 360 को चुरवाकर अपने आश्रम में मंगवा लिया और उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर उनसे घृणित कार्य करवाया गया और जब गंगा माता ने उन पाषाण मूर्तियाँ बने रहे 59640 सगरपुत्रों का उद्धार किया, तब शुक्राचार्य कि कैद में रह रहे उन 360 पुत्रों का भी चुपके से उद्धार कर दिया और उनके समूह का नाम “रैगर” और उनके व्यक्तिगत नामकरण उन शब्दों से कर दिया जो वर्तमान रैगर गोत्रनाम हैं। श्री गंगा माता ने उन 360 रैगरों को आदेश दिया था कि वे पश्चिमी आर्यावर्त के मरुक्षेत्र में पहुंचकर, अपनी वंशवृद्धि करें और निम्न कर्मकर अपना जीवनयापन करें। वहां आने के बाद ब्रहमाजी ने आदेश दिया कि उनके नामों से उनके वंशजों के गोत्र नाम बनेंगे।
           इस प्रकार श्री रमेशचंद्र जलुथरिया ने अधोगामी सोच उपागम को अपनाया और रैगर जाति को जन्मजात पतित बताया।
कल्पना करना गलत नहीं है, परंतु वह देशकाल कि दृष्टि से सही भी लगनी चाहिये। जबकि श्री रमेशचंद्र जलुथरिया खुद ने भी रैगर जाति का उपहास किया और अपनी खुद की जाति का उपहास करने के लिए एक़ नई मनगढ़ंत बात जनसाधारण के बीच उछाल भी दी है।
वस्तुतः रैगर जाति की उत्पत्ति के लिए, जो कल्पना उच्च वर्ग के विद्वानों ने भी नहीं करनी चाही थी, वह कल्पना श्री रमेशचंद्र जलुथरिया ने कर दी है।

भारत आजादी से पूर्व मूल रैगर गोत्रनामों में संशोधन

           जाट जाति में इया-प्रत्ययीकृत गोत्रनामों से इया-प्रत्यय और वाल-प्रत्ययीकृत गोत्रनामों से ल-शब्दांश को हटाने की प्रक्रिया भारत की आजादी से पहले ही शुरू हो गयी थी। रैगर लोगों ने भी कई गोत्र नामों को संशोधित कर लिया था, जिसकी पुष्टि संवत 1998 विक्रमी(स. 1940-41 ईस्वी) में प्रकाशित स्वामी जीवारामजी महाराज के ग्रंथ “श्री रैगर जाति वर्णप्रकाश गोत्रशिक्षा”, से होती है। उसके अनुसार करड़िया, कुण्डरिया, चूंदवाल, चांदोलिया, जाटवाल, ड़ाडवाल, नैनवाल, नूनवाल, बोहरिया, चुनबुंकिया, भुराडिया, माड़िया, मांदोरिया, महरिया, लूलवाल, सालिया, साड़िया आदि गोत्रों को क्रमशः कराड़, कुण्डरा, चूंदवा, चांदेला, जाटवा, डाडवा, नैनवा, नूनवा, बोरा, चुनबुंका, भुरण्डा, मड़ा, मांडोर, महर, लूलवा, साला, सड़ा आदि ध्वनियों में उच्चारित कर लिया था।
           श्री जीवनराम गुसाईवाल के ग्रंथ “प्राचीन रैगर इतिहास अर्थात रैगर गोत्र वंशावली” के अनुसार भारत की आजादी के आस-पास खटनावलिया, गाड़ेगावलिया, जगरवाल, फलवाड़िया, मौरिया, रातावाल, रठाडिया, सुवासिया, अटोलिया, उमराविया आदि गोत्रों को भी क्रमशः नवल, गढवाल, जाग्रत, फूलवारी, मौर्य, रावत, राठोड़िया/राठोड़, खेतावत, अटल, उमराव आदि ध्वनियों में उच्चारित कर लिया गया था।

रैगर गोत्रनामों की सूची:-

           रैगर समुदाय में लगभग 360 गोत्रवंश हैं।[1][2] इस  समुदाय की  गोत्रनाम प्रणाली 5000 वर्ष प्राचीन है, जो एक सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर है। परन्तु स्वयं रैगर इस धरोहर को उजाड़ने में लगे हुए हैं। कुछ वर्षों से रैगर गोत्रनामों को संशोधित या बदलने का चलन आम हो गया है। निम्नांकित रैगर गोत्र सूची में मूल गोत्रवंशों के नामों के साथ छोटे कोष्ठक( ) में उसका क्षेत्रीय ध्वनि रूपान्तरण; मझले कोष्ठक{} में उसका गढा गया एवजी नाम और बड़े कोष्ठक[ ] में उसका संशोधित रूपान्तरण अंकित किया गया है-

वास्तविक रैगर गोत्रनाम मय संसोधित उच्चारण

1- कचावटिया [कुवटिया]
2- कटारिया
3- कटूमरिया (कठूमरिया, खटुमरिया)
4- कंजोटिया
5- कंवरिया [कंवर]
6- कनवाड़िया (कनवा) {कानव}
7- कमानिया
8- कमोखरिया (खमोकरिया, खमूकरिया, खमोगरिया,कमोतरिया )
9- करकरिया (करकड़िया/करखड़िया/खरकड़िया/खटकड़िया/खटखड़िया)
10- करकवाल :: करक करवंश की एक शाखा थी। करक महाभारतकालीन एक राजवंश था।
11- करनिया (करणिया) [करणी]
12- करवाल (करावाल, कर्रावाल, करावल)
13- कराईवाल (करायीवाल)
14- कराड़िया [कराड़] {कोमल}
15- करोतिया
16- काईवाल (केईवाल)
17- काचरोलिया {कचोलिया}
18- काण्डवाल [काड़ावाल]
19- कांकरीवाल
20- कांवटिया
21- कांसोटिया (कसोटिया) {कमल}
22- कानखेंचिया (कानखींचिया)
23- कानखेड़िया (खानखेड़िया) [खेड़िया, केड़िया]
24- कानपुरिया (खानपुरिया)
25- कायलीवाल
26- काशीवाल [काशिया]
27- किरावलिया (करावलिया) [किरावला] {किरावता}
28- कीकरीवाल (कींकरीवाल)
29- कुड़किया
30- कुण्डारिया [कुण्डारा]
31- कुण्डारीवाल
32- कुरड़िया {कुलदीप} [कुड़िया, कुरिया]
33- कौटिया
34- कौलिया (खौलिया)
35- कौशिया [कोसी]
36- खजोतिया
37- खटनावलिया {खन्ना, खाण्डा, खाण्डेकर } [खटनाल, खन्नावलिया, नवल]
38- खाटोलिया (खटोलिया)
39- खतरीवाल (खतारीवाल/खटरीवाल)
40- खरेटिया (खरेंटिया)
41- खींकरिया (खींखरिया)
42- खेरातीवाल
43- खौरवाल (खुरवाल)
44- गण्डसाड़िया (गण्डसारिया)
45- गण्डोलिया
46- गर्गवाल
47- गरगावारिया (घरघावरिया)
48- गरण्डवाल {गण्डवाल, गण्डवार, गौडवाल, गंगवाल, गंगवार}:: गरण्ड व गण्डवाल दो जाट गोत्र है।
49- गरवारिया (घरबारिया)
50- गहनोलिया (गेणोलिया, गाणोलिया) [गेणलिया] {गहलोत}
51- गाटोलिया (गाठोलिया, घाटोलिया)
52- गाड़ेगावलिया {गढ़वाल, गडवाल, गडवार, गाडगिल, गाढ़वी}
53- गाड़ोदिया (गोड़ोदिया) [गाड़ोतिया]
54- गांगड़ोलिया (गांगरोलिया, गागरोलिया)
55- गावड़िया (घावड़िया)
56- गीगरीवाल (गींगरीवाल)
57- गुगड़ोदिया (गगड़ोदिया)
58- गुणसारिया
59- गुमानिया (गुमाणिया)
60- गुसाईवाल (गुसाईवार) {गोस्वामी:: गुसीवाल का ध्वनि रूपान्तरण लगता है : गुसी सूर्यवंशी राजा थे।
61- गेसीवाल
62- गोगोरिया [गोगारिया, गोगेरिया, गंगोरिया]
63- गोटवाल (गोठवाल)
64- गोपरिया
65- गोरखीवाल {गोस्वामी}::गोरक महाभारतकालीन राजवंश था।
66- गौरिया
67- गौलिया {गोयल}
68- चंगेरीवाल (चंगेरीवाल) {चांवत, चावड़ा}
69- चमनानिया (चमनाणिया, चमननिया)
70- चांदोरिया (चांदोरा, चांदेरा)
71- चांदोलिया [चांद/चांदोला/चांदला/चांधेला] {चंदेल, चंद्रोदय}
72- चीचरिया
73- चीचरीवाल (चींचरीवाल)
74- चूंदवाल (चून्दवा) {चौपड़ा}
75- चूंवाल :: चौहान का ध्वनि रूपान्तरण (चूवा/चवाल/चुहाणिया)
76- चूनबोकिया [चूनभूका/चतभूका]
77- चोमोइया (चोमोया)
78- चोरोटिया (चोरेटिया) {चोरोड़िया, चोरसिया}
79- चौथवाल (चूतवाल/चतवाल/चूंटवाल)
80 चौमिया {चौहान}
81- चौलिया (चूंवलिया)
82- जगरवाल {जाग्रत}
83- जगरिया
84- जगेनिया (जघीनिया/जंगीनिया/झंगीनिया)
85- जबलपुरिया
86- जबलीवाल
87- जरगेटिया (झरगेटिया)
88- जरजरिया (जरझरिया/झरझरिया)
8
9- जलूथरिया (जलुतरिया, जरुतरिया) {जलदीप, जलथानिया, जलथानी, जलज, जवानिया, जलंधर}
90- जागरीवाल (जगरीवाल) [जाग्रत]
91- जागेटिया
92- जाजोरिया [जौरिया, जौड़िया]
93- जाटवाल (जाटवा)
94- जाटिया
95- जाटोलिया (जाटोल) {तंवर} :: जाटोल तंवर राजपूतों का एक नख(शाखा) है।
96- जाडेटिया (जाडेतिया)
97- जाडोटिया (जाडोतिया, झाड़ोतिया)
98- जाड़ोलिया (झाड़ोलिया)
99- जाबडजाटिया
100- जाबडोलिया (जाबरोलिया, जावरोलिया)
101- जारोटिया (जरोटिया, झरोटिया, झारोटिया)
102- जीजरीवाल (जींजरीवाल)
103- जुगादमहरिया (जुगादमहर)
104 – जैनिया
105- जैरथवाल
106- जैलिया
107- जौजिया (जौझिया, जौकिया)
108- जौनवाल (जूनवाल, जूणवाल जोनवार, जोणवार, जेणवाल, जेनवाल, जनवाल)
109- जौमदरिया (जौमधरिया)
110- जौलिया (जूंवलिया) {ज्वाला, जेलिया:: रैगर गरिमा में मुद्रित है}
111- टटवाड़िया (टठवाड़िया) [टण्वाड़िया]
112- टाकरिया (ठाकरिया, टागरिया, ठागरिया)
113- टीकरिया (टींकरिया, ठीकरिया)
114- टीटरीवाल (टींटरीवाल) [टेटरीवाल]
115 – टीटोइया
116- टीटोडिया
117- टोंकीवाल (टूंकीवाल, टूंकीवार)
118- टुमानिया (टुमणिया/टुमाणिया)
119- टेटवाल (टेटवार)
120- टेडवाल (ठेडवाल)
121- टौलिया
122- डचेनिया (डचेणिया)
123- डडवाड़िया (डीडवाड़िया) [डोडवाड़िया]
124- डडवानिया (डीडवानिया)
125- डडवालिया
126- डडोरिया (डिडोरिया, ड़ण्डोरिया, डिण्डोरिया) [डडेरिया] {दूदारिया}
127- डण्डोलिया (डण्डुलिया) [डडुलिया, डडलिया]
128- डबरिया [डाबरिया]
129- डबलीवाल
130- डलवाडिया (डालवाड़िया)
131- डाईवाल (डाइवा)
132- डागरीवाल
133- डाडवाल (डाडवा, डडवाल)
134- डीगवाल [ डिगवाल, डीगरवाल, डींगरवाल]:: अयोध्या के सूर्यवंशी महाराजा दीर्घ के वंशज दीर्घवाल वंश के रग रघुवंशी क्षत्रिय कहलाए थे, जो  आगे चलकर डीगवाल वंश के क्षत्रिय कहलाये और उन्हीं के वंशज आज डीगवाल गोत्र के रैगर कहलाते हैं ।  ऐसा कहा जाता है कि महाराजा दीर्घ के नाम से बसाया  गया दीर्घ नगर ही आज का डीग  है, परंतु यह नगर डीगवाल वंश के रग क्षत्रियों द्वारा बसाया जान पड़ता  है । [3]
135- डीगरीवाल (डींगरीवाल) [डोंगरीवाल, डोंगरीवार, डोंगरवाल]
136- डीडरीवाल (डींडरीवाल)
137- डेरवाल (डहरवाल ढहरवाल ढ़ेरवाल)
138- डौडिया
139- डौरिया (डूरिया)
140- डौलिया
141- तगाया (तगाइया, तिगाया, तिगाइया)
142- तंवरिया
143- तरमोलिया (टरमोलिया)
144- तलेटिया
145- तसीवाल (तसईवाल, तुसीवाल, तुसईवाल)
146- तालमहरिया (तालमहर)
147- तालचरिया (तालचटिया)
148- तीतरिया
149- तीतरीवाल (तींतरीवाल)
150- तुनगरिया (तुणगरिया, तोनगरिया, तौनगरिया, तौणगरिया) {तंवर}
151- तुलिया :: तौलिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
152- दतेरीवाल (दूतेरीवाल, दंतेरीवाल)
153- दबकारिया
154- दबकिया {दकिया, दक्या}
155- दीदरीवाल (दींदरीवाल)
156- दुलारिया
157- दूदारिया
158- दूधिया (दधिया) :: दौदिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
159- दून्दरीवाल (दून्तरीवाल)
160- देवतवाल (देवतवार) [देतवार, देवत, दावत]
161- दोतानिया (दोताणिया) [दातोनिया ] {दीवान, दिनकर, दांता}
162- दोदरीवाल (दोंदरीवाल डोडरीवाल)
163- दौरिया (दूरिया, दूड़िया, दौहरीया) {दरिया, दूरिड़ा}
164- दौलिया {दलिया}
165- धनवाड़िया
166- धानोलिया
167- धाकमधड़िया
168- धावड़िया
169- धूडिया {दरिया}
170- धोवड़िया
171- धौलखेड़िया (धौलखेरिया) [धवल]
172- धौलपुरिया {धवल, पंवार} :: धौलपुरिया परमार(पंवार) राजपूतों का एक नख(शाखा) है।
173- धौलिया
174- नटिया :: नाटिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
175- नंगलिया (नंगड़िया) {नवल, नागर}
176- नमलिया
177- नरानिया (नराणिया, नरेणिया) {नागर}
178- नवलिया (नवल)
179- नाडोलिया (नाडोरिया)
180- नारोलिया (नारेलिया, नरेलिया) [नाररोलिया]{निराला, नागर}
181- नावड़िया
182- नीचिया :: नैचिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
183- नींदड़िया (नौंदरिया)
184- नुवाल (नवाल) {नवल}
185- नूनिवा
186- नैणिया
187- नैनवा
188- नौगिया {निर्मल, नागर}
189- पचेलिया (पंचेलिया)
190- पछावड़िया (फछावड़िया) :: पशवाड़िया उपवंश नाम का एक ध्वनि रूपांतरण लगता है।
191- पटूंदिया (फटूंदिया) :: पाटोदिया उपवंश नाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
192- पदावलिया
193- पदावाल
194- पनीवाल :: पानीवाल वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
195- परसोया (परसोइया) {पारस}
196- पलिया (पलैया) :: पालिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
197- पाछासरकणिया :: पाराशरकनिया उपवंश नाम का एक ध्वनि रूपांतरण लगता है।
198- पिंगोलिया (पींगोलिया, पिंगल) {पंकज}
199- पीपलसानिया
200- पीपलिया (पीपल्या, पीयपलिया)
201- पीपलीवाल
202- पूंजीवाल
203- पूनखेड़िया
204- पूरिया (परिया):: पौरिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
205- पैड़िया {पाण्डे, पैण्डिया}
206- पौरवाल
207- फलवाड़िया (फुलवाड़िया, फुलवारिया, फूलवारिया) {फुलवारी, फूल}
208- फीफरीवाल :: पींपरीवाल वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
209- फूंकरिया :: पौखरिया वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
210- फोपरिया
211- बगरोलिया
212- बगसणिया (बागसणिया)
213- बछामदिया (बछांवड़िया/बछावदिया)
214- बछेड़िया (बसेड़िया)
215- बडारिया (बढारिया, भडारिया)
216- बड़ीवाल
217- बजेड़िया (भजेड़िया)
218- बड़ेतिया (बड़ेटिया)/बड़ोतिया
219- बड़ोदिया
220- बड़ोलिया (बाड़ोलिया)
221- बदरिया {बोथरिया}
222- बदलोटिया (बदरोटिया)
223- बंदनवाल (बंदनवार)
224- बंदरवाल (बंदरवार, बनरवाल) {बेनीवाल}:: भद्रवाल  वंशनाम का रूपान्तरण है ।
225- बंदोरीवाल {बूंदोलिया, बुंदेलिया, बूंदेला}
226- बबरीवाल
227- बम्बोरिया
228- बराण्डिया
229- बसेटिया [सेठिया, सेठी] :: बसेटिया गोत्र सैटिया वंश का उपवंश है।
230- बाईवाल
231- बागोरिया (बगौरिया, बाघोरिया)
232- बाजोरिया
233- बाजोलिया (बजेलिया)
234- बांसीवाल [बंशीवाल] {बंसल}
235- बांसोटिया (बासोटिया)
236- बारोलिया (बरोलिया)
237- बालोटिया {भट्ट}
238- बावरिया [बावटिया]
239- बासनवाल [बंशीवाल] {बंसल}
240- बिजैपुरिया (बजैपुरिया, विजयपुरिया)
241- बिनोलिया (बिणोलिया) [बिणेलिया]
242- बिलोनिया (बिलोणिया, बीलूणिया)
243- बिसनोरिया
244- बिसनोलिया
245- बीछीवाल
246- बीबरीवाल (बींबरीवाल)
247- बुहारिया
248- बेवरिया (बेबरिया)
249- बोकोलिया [बाकोलिया, बकोलिया, बंकोलिया] { बाकलीवाल, बोकड़िया}
250- बोहरिया (बोहरा, बोरा)
251- भैरवाल (भहरवाल) [भोरीवाल] :: बैरवाल वंशनाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
252- भागरीवाल
253- भांकरीवाल (भांखरीवाल)
254- भाटीवाल :: वाट राजवंश की वाटीवाल उपशाखा नाम का एक ध्वनि रूपांतरण है। [भाटी] {भाटिया}
255- भुराड़िया [भूरातिया] {भूरंडा, भंवरिया, भंवर, बरड़िया, भूराज्य}
256- भैंसिया :: सूर्यकुल के विंस राजवंश की बैंसिया वंशनाम का ध्वनि रूपान्तरण है।
257- भैंसिवाल :: सूर्यकुल के विंस राजवंश की वैंसीवाल उपशाखा नाम का ध्वनि रूपान्तरण है।
258- भौजपुरिया (भोजपुरिया, भेजपुरिया)
259- भौपरिया (भोपरिया)
260- भौरिया
261- भौसवाल :: भूष(बुस) राजवंश की भौषवाल(बौसवाल) उपशाखा नाम का ध्वनि रूपान्तरण है।
262- मजेरीवाल (मंजेरीवाल) [मजोयवाल] {मंजीरिया}
263- मड़ा:: माड़िया वंशनाम का संकुचन है।
264- मण्डरावालिया [मडरावालिया]
265- मण्डारीवाल
266- मण्डावरिया [मण्डावरे, मण्डारे, मण्ड़ेरिया]
267- मण्डोलिया (मण्डोरिया)
268- मण्डावरिया
269- मदनकोटिया
270- मदारीवाल
271- मंगलिया (मगलिया)
272- मन्दोरीवाल
273- मनेसिया (मणेसिया)
274- मरमटिया [मरमट]
275- महरिया (महर)
276- माचावाल (मचावाल, माचीवाल, मचीवाल)
277- माटोलिया (मांटोलिया)
278- मान्दोरिया (मन्दोरिया, मौन्दोरिया, मांदोंलिया मादोंरिया) [मान्दोर, माण्डोर, मण्डोरिया]
279- मानोलिया (माणोलिया, माणेलिया)
280- मासलपुरिया (माछलपुरिया)
281- मीमरीवाल (मींमरीवाल)
282- मुचेतिया [मचेटिया : रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि ]
283- मुरदारिया
284- मुराड़िया (मराड़िया, मुराणिया)
285- मूंजीवाल
286- मूंडोतिया (मंडेतिया, मुडोतिया)
287- मेमोलिया
288- मेवलिया
289- मोरतलिया (मोरथलिया) {मेरवालिया:: रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि}
290- मोरनीवाल [मोरनी] {मेरलीवाल:: रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि}
291- मोरवाल {मेरवाल:: रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि) [मोरीवाल{मेरीवाल:: रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि}]
292- मोरोलिया [मेरोलिया]
293- मोलपुरिया (मूलपरिया)
294- मोसलपुरिया
295- मोहनपुरिया (मूनपुरिया)
296- मौनिया (मौणिया, मुहाणिया, मुहानिया)
297- मौरिया (मोहरिया, महोरिया){मोर्य, मौर्य}
298- मौलिया (मोहलिया, महोलिया){मोहिल, मालवीय}
299- रगसनिया {रसगनिया, रसगणिया}
300- रचोइया (रछोइया, रच्छोया) {रक्षपाल, रचियता}
301- रठाड़िया (रिठाड़िया) {राठौडिया, राठौड, राठी}
302- रागोरिया
303- राचावल (रांचावल)
304- राजोरिया [रजोरिया, राजेरिया]
305- राठीवाल :: रट राजवंश की राटीवाल उपशाखा नाम का ध्वनि रूपान्तरण है। {राठी}
306- राण्ठोणिया
307- रातावाल {रावत}
308- रूंठड़िया
309- रेहड़िया (रेडिया) {रेड्डी}
310- रौचिया (रौछिया, रौंछिया)
311- लकीवाल (लक्कीवाल)
312- लवानिया (लबानिया) [लबामिया/लवाकिया:: रैगर गरिमा में मुद्रण त्रुटि]
313- लावड़िया
314- लुवाणिया (लुबाणिया)
315- लैलिया (लीलिया)
316- लूलवाल (लूलवा) :: लूल वंश की लोलवाल उपशाखा नाम का ध्वनि रूपान्तरण है।
317- लौगिया (लौंगिया) [लेगिया]
318- लौणिया (लूणिया)
319- लौदवाल [लेदवाल]
320- लौनवाल (लौणवाल)
321- लौदिया [लेदिया]
322- सकरवाल (सक्करवाल) {शुक्ला}
323- सगोइया (सगोया, सागोया)
324- संजीवाल
325- सड़ा :: साड़िया वंशनाम का संकुचन है।
326- सड़ोदिया
327- सनवाड़िया
328- सबदाड़िया
329- सबलानिया (सबलाणिया, सबल)
330- सरसूनिया (सरसूणिया, सरसाणिया) [सरनसुनिया]
331- सरावण्डिया
332- सवासिया (सवांसिया, सुवासियां) [सुवारिया] [चौहान, खेतावत:: चौहान राजपूतों के नख हैं। ]
333- साटोलिया (सांटोलिया)
334- साठीवाल (सांटीवाल)
335- सारोलिया (सरोलिया)
336- साला (सला) :: सालिया वंशनाम का संकुचन है।
337- सालोदिया
338- सिकवाल (सिखवाल)
339- सिंगाड़िया (सिंघाड़िया, सिंगारिया) {सिंघल}
340- सिरोहिया (सरोया)
341- सीसवालिया
342- सीवाल (सींवाल, सींवार)
343- सुंदरीवाल
344- सुनारीवाल (सुंदारीवाल, सोनोरीवाल) [सोनीवाल, सुनारिया]
3
45- सूरीवाल :: सौरीवाल उपशाखा नाम का एक ध्वनि रूपांतरण है।
346- सेजीवाल
347- सेटीवाल :: सिट राजवंश की सैटीवाल उपशाखा नाम का ध्वनि रूपान्तरण है। (सेठीवाल)
348- सेंदीवाल
349- सेरसिया (शेरसिया) [सेरसा, शेर] { सेहरावत, शहरावत}
350- सेवड़िया
351- सेवलिया {सांवल}
352- सोडमहरिया (सोडमहर, सौढमहर
353- सोनवाल
354- सौखरिया (सोंकरिया, सूंकरिया, सुकरिया, सुखरिया) {सुखाड़िया}
355- सौखिया (सौंखिया, सूंकिया, सूंखिया) [सुकिया]
356- सौलिया (सौरिया)
357- हटकिया [हटविया:: श्री चंदनमल नवल के ग्रंथ में मुद्रण : इस गोत्र के लोग मेवाड़ में रहते हैं।]
358- हंकारिया (हुन्कारिया)
359- हंजावलिया (हजावलिया) [हंजोलिया]
360- हंदेरिया
361- हनोतिया (हणोतिया)
362- हनोलिया (हणोलिया)
363- हरडोनिया (हरडोणिया, हरडूणिया, हरदोणिया)
364- हाथीवाल
365- हिण्डोनिया (हिण्डोणिया, हिन्दुणिया, हिनूनिया, हिनोणिया, हिनोनिया, हिनुणिया, हिनोंरिया, हिनोलिया)
366- हिण्डोलिया
367- हिंगोनिया (हींगूणिया)
368- हुधारिया (हधारिया)
369- हैडिया
370- हौनवाल (होणवाल)
371- हौलिया (हौरिया)
372- अकरणिया {अंकुर}
373- अकलोरिया (इकलोरिया)
374- अटारिया
375- अटावदिया
376- अटावनिया (अटावणिया, अठावनिया)
377- अटावरिया
378- अटोलिया (आटोलिया, अटल, अटूलिया, हटूलिया)
379- अनदोरिया (अणदोरिया, इन्दौरिया)
380- अमरोइया (अमरोया)
381- अरवाल (अहरवाल/ऐरवाल) [अगरवाल, आगरवाल]
382- अलवलिया (अलबलिया)
383- अलवाड़िया (आलवड़िया)
384- अलोलिया (अलूलिया)
385- आदमहरिया (आदमहर)
386- आरटिया (आरठिया) [आटिया ]
387- आलोदिया (अलोदिया) [आलोडिया]
388- आलोरिया (अलूरिया)
389- आसीवाल (असवाल)
390- आसोदिया
391- ऐलिया
392- ओरण्डिया
393- औरकिया :: उरक राजवंश की एक शाखा है। उसने मेसोपोटेमिया में ईसा पूर्व शासन किया था।
394- ओलानिया (ओलाणिया)
395- औलेडिया (आलडिया)
396- ओलुण्डिया (उलूण्डिया)
397- ओवरिया
398- औसिया (ओसिया)
399- उच्चेनिया (उच्चेणिया)
400- उज्जैनिया (उजीणिया, उजेणिया, उजेनिया) {उज्जवल}
401- उजीरपुरिया {ओजवानी}402- उत्तेनिया (उतेणिया)
403- उदेनिया (उदीणिया, उदेणिया) [उदय]
404- उदैपुरिया (उदेयपुरिया, उदयपुरिया)
405- उधारिया
406- उधारीवाल :: उड्र राजवंश की उपशाखा उड्रीवाल का ध्वनि रूपान्तरण लगता है।
407- उमराविया (उमराव)
408- उमरिया
409- उरसरकिया:: उरसारकिया उपवंश का ध्वनि रूपान्तरण है।(उरेसरकिया, उरेसरक्या) [उरेसक्या]
410- ऊंचिया
411- ऊंजीवाल
412 – ऊंदरीवाल :: उण्ड्र राजवंश की उपशाखा उण्ड्रीवाल(ऊंद्रीवाल) का ध्वनि रूपान्तरण है। {उदय}
413- ऊंनिया

श्री रुपचन्द जलुथरिया केआभासी रैगर गोत्रनामों कि सूची

1- ककरीवाल
2- कचोलिया
3- करवारिया*
4- करावता**
5- कापलीवाल*
6- खण्डारिया*
7- गाड़ोतिया**
8- गागरोलिया*
9- गुदावालिया*
10- जीरोतिया*
11- झाड़ोदिया* (जाडोदिया::रैगर गरिमा में मुद्रण)
12- टीकरीवाल(टींकरीवाल)*
13- डण्डोरिया**
14- डागरवाडिया*
15- डिण्डोरिया**
16- डोडरिया*
17- तगावलिया*
18- दिदावलिया*
19- धानोतिया*
20- पूतखेड़िया*
21- पाटोलिया*
22- पिचुमरिया*
23- बरवाड़िया*
24- बहरवाड़िया*(बहरावण्डिया::रैगर गरिमा में मुद्रण)
25- बांदोरिया*
26- बिलोदिया*
27- बिसनोदिया*
28- बूटोलिया*
29- बोरदिया*
30- भंडारिया*
31- बिलोदिया*
32- भूरण्डा**
33- भूतोलिया* (भूतोडिया ::रैगर गरिमा में मुद्रण)
34- मटपुरिया*
35- मण्डालिया*
36- मामडोलिया*
37- मालोनिया*
38- मोरडिया*
39- मोरदिया*
40- सतवाड़िया*
41- समदपुरिया*
42- सामरिया* (समरिया::रैगर गरिमा में मुद्रण)
43- सुंदरवलिया*
44- हरनोदिया*
45- हिंगोटिया*
46- अरनिया*(अरणिया)
47- आमोलिया*
48- इंदौलिया*
49- उमरीवाल*

——————————————-

संदर्भ-
[1] रैगर विद्वानों ने अपने-अपने ग्रन्थों में रैगर गोत्रनामों की सूची भी दी है, परन्तु उनमें अनेक मुद्रण त्रुटियां परिलक्षित होती है, शायद उन्होंने भाषा संशय संशोधन(proof reading) को गंभीरता से नहीं लिया। कई विद्वानों ने अटवानिया और अठवानिया; कानखेडिया और खानखेडिया; कानपुरिया और खानपुरिया; टाकरिया और टागरिया/ठाकारिया; टेटवाल और टेठवाल; पटूंदिया और फटूंदिया; पछावाड़िया और फछावाड़िया; बडारिया और भडारिया आदि जैसी कई युग्म उच्चारण ध्वनियों को अलग-अलग गोत्रवंश बता दिया है। इसी प्रकार से कराड़िया और उसके संशोधन कराड़; भुराड़िया और उसके संशोधन भुरण्डा; उमराविया और उसके संशोधन उमराव; खटनावलिया और उसके संशोधन नवल आदि जैसी कई युग्मो को भी अलग-अलग गोत्रवंश बता दिया है। हमने वास्तविक रैगर गोत्रनामों की उक्त सूची उक्त ग्रन्थों व जाट इतिहास ग्रन्थों के आधार पर और कई रैगर लोगों से पूछताछ कर तैयार की है। संभव है कि कुछ रैगर गोत्र हमारे द्वारा तैयार की गयी सूची में शामिल होने से रह गये हों अथवा हमने भी किसी मूल रैगर गोत्र और उसके संशोधित, ध्वनि रूपान्तरण या एवजी शब्द को अलग-अलग गोत्र बता दिया हो, जिसकी दुरुस्ती के लिए सुझाव सादर आमंत्रित हैं।

[2]- भरतपुर क्षेत्र के गांवनामों से प्रेरित होकर श्री रुपचन्द जलुथरिया द्वारा कल्पित किये गये, कुछ गोत्रनाम ऐसे भी हैं कि जो न तो वर्तमान रैगर समुदाय के गोत्रनाम हैं और न ही उक्त क्षेत्र में रैगरों से बने जाटवों के गोत्रनाम है और न ही उनसे पूर्व के किसी विद्वान ने उनको रैगर गोत्रनाम बताया था,  जलुथरिया जी का अनुसरण करके एक पत्रिका में उनको भी रैगर गोत्र बता दिया है, जो सही नहीं लगता है।
परंतु यह सही है कि इनमें से कई शब्दों से अन्य जातियों में गोत्र विद्यमान हैं।

[3]- हमारे  द्वारा एक ग्रंथ में प्रत्येक रैगर गोत्रवंश की उत्पत्ति का इतिहास तैयार किया है ।

छिगनलाल वर्मा (गुसाईवाल) R. A. S.(rtd.)

                                                     ग्राम बिचून जिला जयपुर

35 thoughts on “Vastvik Raiger Gotra Naam”

    1. भाई फिर भी अपन sc मैं आते हैं इस हिसाब से अपन राजपूत हुये general मैं क्यो नही किया जाता अपन को या संविधान जातिपरीवर्तन का प्रावधान भी नही दिया गया

      1. मोहितजी,
        जरा समझने की कोशिश करो ।
        सभी प्राचीन क्षत्रियों के वंशज आज राजपूत नहीं है ।
        जाट, गूजार, कुमावत, सुनार आदि भी क्षत्रिय हैं, परंतु राजपूत नहीं हैं ।
        कौन क्या है और उसके बाप दादा क्या थे ?, दोनों बातों में अंतर है ।
        रैगरों ने अपने बाप दादाओं की तरह बनाने की कोशिश ही नहीं की है , बल्कि स्वार्थ में फंसे रहे।
        राजपूत तो 1942 में ही आपको राजपूत बना रहे थे और बाबा साहब ने भी आपको 1936 की SC List में शामिल नहीं करवाया था । कहा तो यह भी जाता है कि भारत की आजादी के बाद बनी पहली SC List में भी रैगर को शामिल नहीं किया गया था ।
        SC List को ढंग से पढ़ो , समझ में आ जायेगा कि रैगर कब-कब SC List में कैसे शामिल हुआ ?

    2. धन्यवाद ,
      मै उज्जेनियाओं का भांजा हूँ तो आप मेरे मामा हुए या बड़े भैया हुए ,
      आपका साथ ही हमे प्रोत्साहित करता है की रैगर समाज के लिए वो करे जो कोई नही करता ।

  1. महत्वपूर्ण यह नही होना चाहिये कि हम क्या थे। महत्वपूर्ण यह हैं कि हम क्या है और क्या करना है, इतिहास को लेकर हम केवल लड़ सकते हैं। लेक़िन वर्तमान में समाज का विकास करने के लिए राजनीतिक विचारधारा से निकल कर संगठित प्रयास करना मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। ये गोत्रो और जातियों के बन्धनों से समाज को नही निकालेंगे तो समाज का बौद्धिक विकास नही हो पायेगा। जितना ज्यादा जातीय अंतर्विवाह होगा उतना ही सही हैं। दूसरा मुख्य मुद्दा समाज मे व्यवसाय की विभिन्नता लाना होना चाहियें। जब तक समाज पुश्तेनी व्यवसाय और सरकारी नौकरियों के पीछे लगा रहेगा तक सामाजिक और आर्थिक विकास नही होगा। उद्योग धन्धो में विभिन्नता से लोगो कौशल का विकास होगा जोकि दूसरी पीढ़ी में स्थान्तरित हो सकेगा।

  2. आपके विचारों में विरोधाभास है।
    आप जिसे रैगरो़ का पुश्तैनी व्यवसाय समझ बैठे हैं, वो ही गलत है।
    इसकी सत्यता जानने के लिये इतिहास का तो सहारा लेना ही होगा।
    कई रैगर भटकी मानसिकता से शासित हो गये हैं।
    वे बाहरी स्वार्थी लोगों से प्रेरित होकर यह मान बैठे हैं कि वे शूद्र है और उनके साथ 5000 साल से अत्याचार किया जा रहा है।
    यद्यपि यह बात गलत है, परन्तु इसे सही बताकर सामाजिक जहर फैलाया जा रहा है। कई रैगर अन्य लोगों को गलत बोल रहे हैं। यह गलत इतिहास सीखने का ही नतीजा है।
    क्या इस गलत इतिहास से रैगरो़ को दिग्भ्रमित होने से रोकने का मेरा प्रयास गलत है?
    रैगर तो यह भी नहीं जानते हैं कि बीसवीं सदी से पहले रैगरो़ पर कभी अत्याचार ही नहीं हुआ है।
    रैगरों को झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है।
    उसे रोका जाये।
    आपने अ़ंतर्जातीय विवाह की बात की है।
    रैगर जाति में ऐसा हो रहा है, परन्तु रैगर जाति में समकक्ष जातियों की बच्चियां की संख्या शून्य है, जिसे आप
    भी जानते ही होंगे कि कितनी है? अंतर्जातीय विवाह का आम चलन हो जायेगा। लेकिन उससे जाति व गोत्र नाम खत्म नहीं होंगे।
    पश्चिमी देश में आज भी विद्यमान है और वहां के लोग अपने पूर्वजों का पता लगवा रहे हैं। एक
    एक हाथ से ताली नहीं बजानी चाहिये ।
    संसार में इतिहास लेखन का महत्त्व है।
    रैगरो़ को अलग मथुरा बसाने की बात नहीं करनी चाहिये।
    रैगरों के पूर्वजों का इतिहास गोरवमय है और वह रैगरों में घर कर गयी हताशा का निवारक भी है।
    मुझे हताश करने के स्थान पर मेरा साथ दें।
    धन्यवाद।
    जय रैगर।

    1. सर जी मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं इतिहास का बहुत बड़ा महत्व होता है और अगर हम नहीं भी चाहे तो सिर्फ हमारे नहीं चाहने से क्या होगा दुनिया तो जातिवादी मानसिकता से ग्रसित है ना इसलिए मैं इस बात से सहमत हूं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती तो वाकई हमें वास्तविक इतिहास जानने का पूरा हक बनता है और जब तक हम तुच्छ स्वार्थ से बाहर निकल कर के अपने वास्तविक इतिहास को नहीं जानेंगे तब तक अपने समाज का स्वाभिमान हम नहीं जगा सकते
      एक और बात sir
      इतिहास का अगर महत्व होता ही नहीं तो 4:30 सौ 500 साल पुराना राम मंदिर फिर से मन नहीं बनाया जा रहा होता शहरों के नाम नहीं बदले जा रहे होते टीवी सीरियल नहीं बनाए जा रहे होते इसलिए श्रीमान मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूं कि हमें सही इतिहास जानना चाहिए लिखना चाहिए आप लिखे सर हमारा समाज का जो युवा है जो भटक गया है उसे सही रहा मिलेगी और यह समाज के हर एक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने आने वाली पीढ़ी को वास्तविकता से अवगत करवाएं उस पीढ़ी में इतनी ताकत है कि जिस दिन वह जान गई कि हम क्या हैं और क्या थे मुझे पूरा यकीन है मेरा समाज आगे बढ़ेगा

      1. श्री सोनवाल जी प्रणाम,
        अपना कीमती समय आपने हमारे आर्टिक्ल को पढ़ने के लिए निकाला,इसके लिए धन्यवाद

  3. आपने रेगर समाज की प्रामाणिक स्रोतों सही उत्पत्ति बताकर , सही गोत्र बताकर रेगर समाज को गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया है।
    आने वाले समय में आपकी पुस्तक रेगर समाज का बहुत बड़ा ग्रंथ साबित होगा। ऐसी मैं ईश्वर तथा माता गङ्गा से कामना करता हूँ।
    जय गंगा मैया
    जय श्री राम
    जय रघुवंशी रेगर समाज

    1. सुरेश जी प्रणाम,
      आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद

  4. आपने रेगर समाज की प्रामाणिक स्रोतों सही उत्पत्ति बताकर , सही गोत्र बताकर रेगर समाज को गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया है।
    आने वाले समय में आपकी पुस्तक रेगर समाज का बहुत बड़ा ग्रंथ साबित होगा। ऐसी मैं ईश्वर तथा माता गङ्गा से कामना करता हूँ।
    जय गंगा मैया
    जय श्री राम
    जय रघुवंशी रेगर समाज

  5. रैगरों के बंद्रवाल वंश की उत्पत्ति कहा से हुई? इनका मूलपुरुष कौन था और इनके गोत्र प्रवरादि क्या है? इनके बारे में आपसे कुछ पता चल सके तो अवश्य बताइएगा।
    मेरे एक मित्र है जो कई वर्षो से अपने वंश के इतिहास पर शोध कर रहे है लेकिन उन्हें संतुषटिजनक ना मिल सका।

    1. मानव जी आपके सवाल का जवाब शीघ्रता से देने के प्रयास जारी है ,
      धन्यवाद

  6. Extremely thankful for the research based information pertaining to origin, clans, etc. of Raigars. The data of various surveys also indicates a considerate strength of the social group. However, lack of proper documentation of genealogical charts, rich culture, social interactions, inadequate representation in geo-political system, an image of united social group (influencing state/national politics), etc are certain areas that needs to be strengthened for our future generation. Looking forward for more contemporary information.

    Regards and best wishes

    1. प्रणाम मुकेश जी,
      आपके द्वारा किए कमेंट से हमे प्रोत्साहन मिलता है,
      रैगर समाज के एक एकीकृत इतिहास की प्राप्ति के लिए हम निरंतर प्रयत्नशील है,
      धन्यवाद

    1. आपके सवाल का जल्द ही जवाब दिया जाएगा,
      धन्यवाद

  7. श्रीमान,
    आपका प्रयास ऒर आपके द्वारा दी गयी जानकारी बहुत ही सराहनीय है और हमारे समाज की जरूरत भी है, मै कोशिश करूंगा की समाज मै ऐसे कई कार्यक्रम आयोजित हो जिससे हमें हमारे समाज के इतिहास को जानकारी दी जाये ताकि आने वाली पीढ़ी को अपना इतिहास ज्ञात हो
    मेरी आपसे एक प्रार्थना और थी मै जाटोलिया गौत्र से हुँ क्या आप जाटोलिया गौत्र की कुलदेवी का नाम बता सकते है
    क्योंकिे मुझे इसकी जानकारी नहीं है… और यदि आपके पास हो to समस्त रेगर जाती के गौत्र की कुलदेवी के नाम भी साझा करें जिससे मेरे जैसे कई लोगो को सहायता मिले
    ……… धन्यवाद

    1. प्रिय लेखराज जी प्रणाम,
      रैगर समाज की कुल देवी माँ हिंगलाज है, जिनका प्राचीन मंदिर पाकिस्तान मैं है,

      1. Sir Ji namskar SANWASIYA, SUNWASIYA, CHOHAN KI KULDEVI KON H iski jankari Dane ki kripa kare

    2. Lekhraj Ji me aapki is bat se sahmat hu agar aapko iski jankari mil gyi ho to mujhe bhi Batana 9529005389

  8. मुझे आप बता सकते है की बिलोनिया गोत्र के लोग जयपुर के किन गावो में है

    1. प्रियंका जी प्रणाम,
      आपके सवाल का शीघ्रता से जवाब दिया जाएगा, कृपया प्रतीक्षा करे,
      धन्यवाद

  9. Hello Sir,

    Hume koshish ye Karni chaiye ke him sab log ek hoke. Regar Samaj ko Sahi Darja dilana bahut karuri hai sir. Imean sabhi logo ko pata lagna chaiye ke asal me regar Ka blood relations kaha tak jata hai. Mahabharata, Ramayana se chala arha hai. Chatriya aur raghuvanshi, Rajputana hai sare.. agar Kabhi is ladai me meri jarurat pade bataiye jarur..

    1. शुक्रिया सचिन जी, आपका प्रोत्साहन एवम साथ ही हमे अपेक्षित है

  10. Thanks a lot🙏🙏🙏
    Apne jo jankari di hai vo atulniya hai . Main GOYAL(golia)gotra se hun .

  11. Sir Ji namskar SANWASIYA, SUNWASIYA, CHOHAN KI KULDEVI KON H iski jankari Dane ki kripa kare

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *