“वर्मा” क्षत्रियसूचक शब्द है और इसका एक इतिहास है, राजस्थान में क्षत्रियसूचक ‘वर्मा’ शब्द के चलन का इतिहास -:-

(1)- “वर्मा” शब्द का महात्म्य-
आर्यों की वर्णाश्रम-व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरुप केवल प्रकार्यात्मक था। परन्तु आगे चलकर इसको जन्म प्रधान बनाकर शर्मा, वर्मा, गुप्ता एवं दास जैसे वर्णसूचक शब्दों से सुदृढ़ कर दिया गया। प्राचीन ग्रंथों में इन चारों शब्दों को क्रमशः धार्मिक, सामरिक, आर्थिक एवं सामाजिक सेवा की दृष्टि से परिभाषित भी किया गया है कि –
(i) शर्मा शब्द ‘शर्मन्’ से बना है तथा शर्मन् = आर्यों के लिये यज्ञादि करने वाले = ब्राह्मण है।
(ii) वर्मा शब्द ‘वर्मन्’ से बना है तथा वर्मन् = भुजबलादि से आर्यों की रक्षा करने वाले = क्षत्रिय है।
(iii) गुप्ता शब्द ‘गुप्तन्’ से बना है तथा गुप्तन् = आर्यों की उदरपूर्ती करने वाले = वैश्य है।
(iv) दास शब्द ‘दासन्’ से बना है तथा दासन् = आर्यों के दास व सेवा करने वाले = शूद्र है।
विष्णुपुराण भाग 03 अध्याय 10 के श्लोक 8 व 9 में उक्त वर्णसूचक शब्दों के बारे में यह भी वर्णित है कि –
ततश्च नाम कुर्वीत पतैव दशमेsहनि।
देवपूर्वं नराख्यं हि शर्मावर्मादि संयुतम् ।। विष्णुपुराण 03, 10, 08 ।।
शर्मेति ब्राह्मणस्योक्तम् वर्मेति क्षत्र संश्रयम्।
गुप्त दासात्मक नाम प्रशस्तै वैश्य शूद्रयोः।। विष्णुपुराण 03, 10, 09 ।।
अर्थात् तदन्तर पुत्रोत्पत्ति के दसवें दिन पिता नामकरण-संस्कार करे। पुरुष का नाम पुरुषवाचक होना चाहिये। उसके पूर्व में देववाचक शब्द हो तथा उसके पीछे शर्मा, वर्मा आदि होने चाहिये।।8।। ब्राह्मण के नाम के अंत में ‘शर्मा’, क्षत्रिय के अंत में ‘वर्मा’ तथा वैश्य और शूद्र के नामों के साथ क्रमशः ‘गुप्ता’ एवं ‘दास’ का प्रयोग करना चाहिये।। 9 ।।
प्राचीन ग्रंथों से प्रकट होता है कि क्षत्रिय राजाओं के नामों के पीछे ‘वर्मन्’ लगाने का आम चलन था। उदाहरणार्थ मौखरी, गुर्जर प्रतीहार तथा दक्षिण भारत के क्षत्रियकुल के राजा-महाराजाओं व उनके राजकुमारों के नामों के साथ ‘वर्मन्’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। परन्तु मध्यकालीन राजपूत क्षत्रियों के नामों साथ सामान्यतः ‘वर्मन्’ शब्द नहीं दिखता है। इसका कारण यह लगता है कि उस समय तक क्षत्रिय समुदाय के प्राचीन क्षत्रिय तथा अर्वाचीन राजपूत क्षत्रिय नामक दो भेद हो गये थे और मध्यकाल तक आते-आते लगभग सभी प्राचीन क्षत्रिय राजवंश राज्यविहीन हो गये थे और नये राजवंशों का उदय हो गया था, जो अर्वाचीन राजपूत क्षत्रिय कहलाये। शायद अर्वाचीन राजपूतों ने अपनी अलग पहचान दर्शाने की दृष्टि से अपने नामों के साथ ‘वर्मन्’ का प्रयोग नहीं किया है। इसलिये उत्तरी भारत के राजपूत शासकों में वर्मा शब्द का प्रचलन नहीं के बराबर दिखता है।
(2)- “पुष्कर क्षात्रधर्म समाज सम्मलेन,1948″ में ‘वर्मा’ शब्द का अंगीकरण-
भारत की स्वतंत्रता से पूर्व केवल कायस्थ समुदाय में वर्मा शब्द का प्रचलन था। परन्तु “पुष्कर क्षात्रधर्म समाज सम्मलेन” के बाद राजपूताना की लगभग 50 से भी अधिक हिन्दू जातियों के सदस्य अपने नामों के साथ क्षत्रियकुलसूचक ‘वर्मा’ शब्द का प्रयोग करने लग गये थे। राजस्थान में इस ‘वर्मा’ शब्द चलन की कहानी यह है कि दिनांक 17 नवम्बर, 1948 ईस्वी को शाहपुरा(भीलवाड़ा) के राजा उम्मेदसिंहजी के सभापतित्व में पुष्कर में “क्षात्रधर्म समाज” का एक वृहद् सम्मलेन आयोजित किया गया था और उसमें उन हिन्दू जातियों को आमंत्रित किया गया था, जिनका निकास प्राचीन अथवा अर्वाचीन क्षत्रियों से माना गया था। उस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन रजवाड़ों द्वारा क्षत्रियकुल की हिन्दू जातियों को उनके साथ जोड़े रखे जाने का था। परन्तु उसके लिये यह आवश्यक था कि उनको भी इस बात का अहसास हो कि वे क्षत्रियकुल के हैं। इसलिये उन जातियों के लोगों को उनके नामों के साथ क्षत्रियकुलसूचक ‘वर्मा’ शब्द को प्रयुक्त करने की एक नयी परम्परा शुरू करवायी गयी।
“क्षात्रधर्म समाज” सम्मेलन में आमंत्रित जातियां(*)

 

क्रम संख्या नाम जाति क्रम संख्या नाम जाति क्रम संख्या नाम जाति
1 राजपूत 15 बणजारा 29 सिख
2 रावत 16 दयामी 30 देसाई
3 मीणा 17 माली 31 पटेल
4 जाट   18 बगसरिया 32 सौंधिया
5 गूजर 19 ओसवाल 33 लौहार
6 सुनार 20 कायस्थ 34 तेली
7 कुम्हार 21 खत्री 35 गोरखा
8 अहीर 22 नायक 36 डोगरा
9 धाकड़ 23 गड़रिया 37 गढ़वाली
10 दर्जी 24 रैबारी 38 मराहा
11 छींपा 25 सिरवी 39 दाबेल
12 तम्बोली 26 भील 40 पहाड़ी
13 लोधा 27 कहार 41 सिंधिया
14 कुर्मी 28 आजणां 42 बंगाली

 

(*)- इनजातियोंकाउल्लेखश्रीचंदनमलनवल RPS(rtd.) नेअपनेग्रन्थ ” रैगरजातिकाइतिहास” मेंभीकियाहै।
यहां पर यह विचारणीय है कि उस “क्षात्रधर्म समाज सम्मेलन” में भील, नायक(धाणका) जैसी जातियों को भी आमंत्रित कर लिया गया था। परन्तु रैगर जाति को आमंत्रित नहीं किया गया था। जबकि उस समय की रैगर जाति की सामाजिक-प्रस्थिति उन जातियों से निम्न नहीं थी। दोयम रैगर जाति को सन् 1941 ईस्वी में ही राजपूताना हिन्दू महासभा, अजमेर(रजि.) ने सूर्यवंशी क्षत्रियशाखा घोषित कर दिया था तथा उसने इस आशय के कई प्रमाण-पत्र भी जारी कर दिये थे और वो सभी प्रमाण-पत्र “आवाज” नामक साप्ताहिक पत्रिका वर्ष 02, अंक 42 में 28 जुलाई, सन् 1941 ईस्वी को प्रकाशित भी किये गये थे। उदाहरणार्थ, उनमें से एक प्रमाण-पत्र की शब्दावली इस प्रकार से थी-
राजपूताना प्रान्तीय हिन्दू महासभा, अजमेर(पंजि.) द्वारा समर्पित
दिनांक 28 जुलाई, 1942 ई.
प्रमाण-पत्र
यह प्रमाणित किया जाता है कि शास्त्रों, प्राचीन इतिहासों और पूर्व ग्रंथों के अनुसरण से सिद्द होता है कि रैगर जाति क्षत्रियों से उत्पन्न एक सूर्यवंशी शाखा है। अब सब हिन्दू नर-नारी से निवेदन है कि वह इनके साथ क्षत्रिय राजपूतों के समान पूर्ण व्यवहार करें।-(धन्यवाद)
इसलिये यह नहीं माना जा सकता है कि रैगर जाति की तत्कालीन सामाजिक-प्रस्थिति के कारण उसको “क्षात्रधर्म समाज सम्मेलन, 1948″ में आमंत्रित नहीं किया गया था, बल्कि रैगर जाति के राजपूत विरोधी कारनामों के कारण सम्मलेन में नहीं बुलवाया गया था, जिनकी जड़ें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में दिखती है। ऐसा पाया गया है कि एक समय दिल्ली व राजपूताना के रैगर लोग भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे थे। परन्तु सन् 1942 ईस्वी के बाद राजपूताना के रैगरबन्धुओं ने एक जाति विशेष से उत्प्रेरित होकर अंग्रेजों का विरोध करना तो छोड़ा और वे राजपूतानी सामंतशाही का खुला विरोध करने लगे गये, जिसका परिणाम यह हुआ कि सम्पूर्ण राजपूत समाज रैगरों से अत्यधिक नाराज हो गया और अनेक राजपूत सामंतों ने कई रैगर स्वतंत्रता सेनानियों को कैद कर लिया और उनको घोर यातनायें दी। ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता सेनानी श्री जयचन्द्र मोहिल(मोहलिया) की आँखों में सुइयां तक चुभो दी गयी थी। श्री ठक्कर बापा और श्री माणिक्यलाल वर्मा ने उनको दिल्ली ले जाकर ईलाज करवाया था। राजपूत रजवाड़ों ने तो “अखिल भारतीय रैगर महासम्मेलन दौसा, 1943″ को भी सम्पन्न न होने देने का पूरा प्रयास किया था, जिसका उल्लेख जयपुर कोतवाली के रिकॉर्ड में विध्यमान है(भूतपूर्व IPS श्री परमानन्द रछोइया का एक निरीक्षण)। परन्तु राजपूताना के ब्राह्मण समुदाय के सहयोग से वह सम्मलेन पूर्णतया सफल हुआ था। उस सफलता से राजपूतानी रजवाड़े रैगरों से और भी ज्यादा नाराज हो गये। जिसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि राजपूतों ने जिस सख्ती के साथ “अखिल भारतीय रैगर महासम्मेलन” का विरोध किया था, उतना विरोध अन्य निम्नवर्ग की जातियों के महासम्मेलनों का नहीं किया था। वस्तुतः रैगरों के अदूरदर्शीपूर्ण कारनामों ने ही रैगरों की जातिगत बेइज्जती करवायी थी।
यह भी सुना जाता था कि निम्नवर्ग की एक जाति के महासम्मेलन को भीमराव अम्बेडकर, काका कालेलकर आदि जननेताओं का खुला समर्थन था। परन्तु रैगर महासम्मेलन आयोजन को लेकर जब जगह-जगह रैगरों के साथ घोर अत्याचार किया जा रहा था तब बाहर का एक भी जननेता आगे नहीं आया था। फिर रैगर जाति कोई सीख नहीं लेना चाहती है, बल्कि आज भी रैगरों की फटे में पैर फंसाने व बिना सोचे समझे भेड़-चाल चलने की आदत लगती है। जिसके कारण रैगर लोग सामाजिक व राजनैतिक नुकसान उठा रहे हैं। उदाहरणार्थ, कुछ वर्षों पूर्व की बात है कि बलाई जाति के महात्मा रामप्रकाश ने अपने “ब्रह्मपुराण” नामक ग्रन्थ में लिखा था कि रामदेवजी मेघवाल(बलाई) थे। इस बात को लेकर तंवर राजपूतों और बलाई-मेघवालों में ठन गयी। जब मामला गंभीर होता दिखा तो महात्मा रामप्रकाश ने “ढोल में पोल″ नामक दूसरी रचना लिख दी और उसमें यह लिख दिया कि जिस कब्र को रामदेवजी की कब्र बतायी जाकर पुजवाया जा रहा है वह किसी मुसलमान की कब्र है। परन्तु रैगर लोग बिना वास्तविकता को जाने ही रामदेवजी को मेघवाल समझकर फूल गये और तंवर राजपूतों के विरुद्ध हो गये, जिसका दुष्परिणाम रामदेवरा रैगर धर्मशाला निर्माण पर पड़ा। स्वामी बालकदासजी ने बताया था कि उन्होंने स्थानीय सरपंच साहब खड़गसिंहजी को विश्वास में लेकर धर्मशाला के निर्माण को आगे बढ़ाया था।
आजकल कुछ रैगर लोग बाबा साहिब की मिशन को पूरा करने के नाम पर केवल ब्राह्मणों और मनुस्मृति की खिलाफत व बौद्धधर्म का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। उनके पास रैगर एकता व रैगरों की सामाजिक, शैक्षिक व राजनैतिक उन्नति का कोई प्रोग्राम नहीं है। बल्कि उनके इस कृत्य को सम्पूर्ण रैगर जाति द्वारा किया जानेवाला कृत्य माना जाता है और उससे नाराज होकर उच्चवर्ग के कुछ प्रतिक्रियावादी लोग कोई न कोई बहाना बनाकर, रैगरों के साथ किसी न किसी रूप में अत्याचार करते रहते हैं। जबकि आरक्षण का फायदा तो अन्य जातियों को भी मिला है। वे न तो रैगरों की तरह अपने मौहल्लों में बाबा साहिब की मूर्ति लगाने की पहल करते हैं और न ही रैगरों की तरह व्यक्तिगत रूप से किसी समुदाय विशेष से दुश्मनी दर्शाते हैं; बल्कि बाबा साहिब के नाम पर राजनैतिक फायदा ले रहे हैं।
(3)- “राजस्थान में वर्मा शब्द” का उत्थान व पतन-
पुष्कर में आयोजित “क्षात्रधर्म समाज सम्मलेन” के बाद तो राजस्थान में ‘वर्मा’ शब्द की बाढ़ ही आ गयी थी। जहां देखो वहां वर्मा ही वर्मा हो गये थे। क्योंकि कायस्थों के अलावा अब उस सम्मलेन में शामिल जाट, सुनार, मीणा, गूजर, अहीर, धाकड़, कुम्हार(कुमावत), माली, दर्जी, छींपा, तम्बोली, लोधा, भील, धाणका, गडरिया, कहार आदि जातियों के राजनैतिक नेताओं, लोक सेवकों, समाज सेवकों, समाज सुधारकों, अन्य पढ़े लिखे और जागरूक बंधुओं द्वारा खुले रूपसे अपने नामों के साथ क्षत्रियसूचक ‘वर्मा’ उपनाम लगा लिया था। इन जातियों के लोग जब अपने आपको वर्मा कहकर सम्बोधित किया करते थे, तब उनके सीनें क्षत्रियों के सामान चौड़े हो जाते थे। परन्तु यह गुबार जल्दी ही ख़त्म हो गया। क्योंकि जिन दरोगा, नाई, राणा(भाण्ड) आदि पिछड़ी जातियों को उस सम्मलेन में नहीं बुलवाया था, उन जातियों के लोग भी अपने नामों के साथ क्षत्रियसूचक ‘वर्मा’ शब्द लगाने लग गये थे। दोयम यह भी एक विशिष्ट संयोग था कि भारत की स्वतंत्रता के साथ ही, एक तरफ तो निम्नवर्ग की जातियों में सुसंस्कृतिकरण की लहर चल पड़ी थी। जबकि दूसरी तरफ सन् 1941 ईस्वी में राजपूताना प्रांतीय हिन्दू महासभा, अजमेर के द्वारा रैगर जाति को सूर्यवंशी क्षत्रिय शाखा घोषित करने की बात से प्रेरित होकर निम्नवर्ग की जातियों में जन्में विद्वानों ने भी अपनी-अपनी जातियों की उत्पत्ति के इतिहास लिखे और अपनी-अपनी जातियों को भी क्षत्रिय जनित बताया। उधर डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भी अपनी कृति “शूद्रों की खोज” में स्पष्ट रूप से यह लिखा कि शूद्रवर्ग की जातियां आर्य समाज के सूर्यवंशी क्षत्रियों से निकली हैं। इसलिये “क्षात्रधर्म समाज” व दरोगा, नाई, राणा(भाण्ड) आदि पिछड़ी जातियों की भांति राजस्थान की निम्नवर्ग की कई जातियों के लोग भी अपने को क्षत्रियवंशज मानकर अपने नामों के साथ ‘वर्मा’ शब्द लगाने लग गये। परन्तु जब भारत का संविधान लागू हुआ तो उसमें निम्नवर्ग की जातियों को अनुसूचित जातियां कहकर वर्णित किया गया, जिसके परिणाम स्वरूप कुछ ही समय बाद यह मानसिकता विकसित हो गयी कि “वर्मा” शब्द “अनुसूचितजाति संवर्ग” का एक नया पर्याय है। ज्ञातव्य हो कि “वर्मा” शब्द का “साहित्यिक पतन” यहीं पर नहीं रुका है, बल्कि आगे चलकर आमसमाज के लोगों ने ‘वर्मा’ शब्द को अनुसूचित जाति संवर्ग की केवल “चमार” जाति का पर्याय मान लिया, जिसके कारण “पुष्कर क्षात्रधर्म समाज” की जातियां एक अप्रत्याशित हीनभावना से ग्रसित हो गयी और अपने संतानों नामों के साथ ‘वर्मा’ लगाना बंद कर दिया। जबकि निम्नवर्ग की जातियों के लोगों ने भी उसी आधार पर अपने नामों के साथ “वर्मा” शब्द लगाना शुरू किया था, जिस आधार पर पुष्कर “क्षात्रधर्म समाज सम्मलेन” की जातियों के लोगों ने शुरू किया था।
(4)- “रघुवंशी रैगर” समुदाय द्वारा क्षत्रियकुलसूचक ‘वर्मा’ शब्द लगाने का औचित्य-
यदि रैगरों से राजपूतों की नाराजगी या राजपूतों के किसी दुर्भावना से ग्रसित हो जाने के कारण रैगर जाति को पुष्कर “क्षात्रधर्म सम्मलेन” में आमंत्रित नहीं किया गया था तो इसका यह तात्पर्य नहीं है कि रैगरों को क्षत्रियकुलसूचक ‘वर्मा’ शब्द लगाने से निषेध कर दिया गया था। बल्कि उस सम्मलेन के 07 वर्ष पूर्व ही “हिन्दू महासभा” ने रैगर समुदाय को सूर्यवंशी क्षत्रिय घोषित कर दिया था। रैगरों के क्षत्रिय होने के कई प्रमाण है। उदाहरणार्थ या तो रैगर गोत्रवंश शब्द कोई जाट गोत्रनाम है अथवा रैगर गोत्रवंश शब्द का जनकशब्द जाट गोत्रनाम है। अर्थात् जाटों के सामान ही रैगर भी जन्मजात क्षत्रिय हैं। इसके अलावा रैगरों को क्षत्रिय साबित करने के लिये इधर-उधर से प्राचीन शब्दों को जुटाने की कोई आवश्यकता भी नहीं लगती है, क्योंकि “रैगर” शब्द “रघु” शब्द का एक परिवर्तित रूपांतरण है-
रघुवंश → रगवंश → रगरवंश → रहगरवंश → रेहगरवंश → रैगरवंश
रघु अयोध्या के सूर्यवंशी महाराजा थे, जिनके वंशज रघुवंशी कहलाये हैं तथा रघुवंश की भांति रगवंश, रगरवंश, रेहगरवंश भी ऐतिहासिक वंशनाम है। इसलिये रघुवंशी(सूर्यवंशी) रैगर क्षत्रियों द्वारा अपने नामों के साथ क्षत्रियसूचक ‘वर्मा’ शब्द को लगाना पूर्णतया उचित था और आज भी उचित है।
वस्तुतः रैगर एक अनुवांशिक समूह(Ethnic Group) है, न कि कोई सामाजिक समूह(Social Group) नहीं है। अर्थात् रैगर एक क्षत्रिय वंशनाम है, इसलिये यदि इस वास्तविकता से अनभिज्ञ लोग रैगरों के सम्बन्ध में कोई ऊल-जुलूल बात करते हैं तो इसका कोई ईलाज नहीं है। कुछ रैगर भाई भी किसी तुच्छ स्वार्थ से शासित होकर इंटरनेट या सरकारी कार्यालयों में “रैगर” शब्द व जाति की गलत परिभाषा पेश करते हैं। जबकि बैरवा, मेघवाल, बलाई, खटीक, धोबी, धाणका, कोली आदि अनुसूचित जातियों के लोगों की सोच यहां तक बदल गयी कि अब उन्होंने भी “क्षात्रधर्म समाज” व दरोगा, नाई, राणा(भाण्ड) आदि पिछड़ी जातियों की भांति अपनी संतानों के नामों के साथ ‘वर्मा’ शब्द को लगाना बंद कर दिया है। क्योंकि इन जातियों के लोग यह नहीं चाहते है कि जनसाधारण उनकी संतानों को “चमार” समझे या कहे।

 

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One thought on “Verma Kshatriya”

  1. इसमें कोली (शाक्य) जो कि भगवान बुद्ध (क्षत्रिय राजा के पुत्र हैं ) और कोली एवं शाक्यों में ही बुद्ध के समय वैवाहिक संबंध थे , कोली राजाओं की सूची गूगल पर उपलब्ध है, परन्तु यहां उन्हें भी बलाई, धोबी, आदि के साथ क्यो दर्शाया है, बुद्ध शाक्य थे जिनके वंशज सम्राट अशोक से वृहदरथ तक राजा रहे ।

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